दुनिया के टेक आकाश में फिर बजा भारतीय प्रतिभा का डंका

पराग अग्रवाल के ट्विटर सीइओ बनना संयोग नहीं : कई दिग्गज कंपनियों की कमान संभाल रहे हैं भारतीय

दुनिया की सबसे लोकप्रिय माइक्रो ब्लॉगिंग साइट चलानेवाली कंपनी ट्विटर के सीइओ के रूप में पराग अग्रवाल की नियुक्ति ने एक बार फिर साबित किया है कि भारतीय प्रतिभा की चमक से पूरी दुनिया की आंखें चुंधिया गयी हैं। क्या गूगल, क्या माइक्रोसॉफ्ट और क्या आइबीएम, हर जगह शीर्ष पर भारतीय ही नजर आते हैं। दुनिया भर में ट्विटर के तीन सौ करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता हैं और हाल के दिनों में यह सूचना के आदान-प्रदान का सबसे विश्वसनीय और तेज स्रोत साबित हुआ है। पराग अग्रवाल की प्रतिभा का लोहा यह कंपनी पहले भी मान चुकी थी, तभी महज आठ साल में उन्हें कंपनी का मुख्य तकनीकी अधिकारी बना दिया गया और अब वह इस कंपनी के प्रमुख के रूप में ट्विटर को नयी ऊंचाइयों पर ले जायेंगे। पराग अग्रवाल की नियुक्ति के बाद एक बार फिर यह बहस छिड़ गयी है कि आखिर भारतीय प्रतिभा अपने देश में इतना क्यों नहीं निखर पाती? आखिर क्या कारण है कि विदेश में जाकर उसी भारतीय को नोबेल पुरस्कार मिल जाता है, जिसे भारत में रहते हुए कोई मान्यता नहीं मिलती? यह एक बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल है, जिसका जवाब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश को तो खोजना ही होगा, दुनिया को भी इसका जवाब देना होगा। पराग अग्रवाल की नियुक्ति की पृष्ठभूमि में दुनिया भर में बज रहे भारतीय प्रतिभा के डंके को रेखांकित करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।

दुनिया की सबसे चर्चित कंपनी टेस्ला के सीइओ एलोन मस्क ने हाल ही में पराग अग्रवाल को ट्विटर के नये सीइओ के रूप में जैक डोर्सी की जगह लेने के बाद भारतीय प्रतिभाओं के लिए एक बड़ी बात कही। मस्क ने स्ट्राइप के सीइओ पैट्रिक कॉलिसन के एक ट्वीट का जवाब दिया, जिसने पराग को बधाई दी और इस बात पर प्रकाश डाला कि छह अमेरिकी तकनीकी दिग्गज अब भारतीय मूल के सीइओ द्वारा चलाये जा रहे हैं। मस्क ने लिखा, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अडोबी, आइबीएम, पालो आॅल्टो नेटवर्क और अब ट्विटर भारत में पले-बढ़े सीइओ द्वारा चलाये जा रहे हैं। प्रौद्योगिकी की दुनिया में भारतीयों की आश्चर्यजनक सफलता को देखना अद्भुत है। यह उस अवसर की याद दिलाता है, जो अमेरिका अप्रवासियों को प्रदान करता है। मस्क ने कहा, भारतीय प्रतिभाओं से यूएसए को बहुत फायदा होता है। कॉलिसन ने लिखा था, बधाई हो, पराग अग्रवाल।

मस्क के ट्वीट में आठ साल पुरानी एक घटना छिपी हुई है। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा सैन फ्रांसिस्को के एक कॉलेज के वार्षिक समारोह में शामिल हो रहे थे। समारोह के बाद विद्यार्थियों का एक समूह उनसे बात करने आया। उस समूह में कुछ भारतीय भी थे। ओबामा ने समूह को दो हिस्सों में बांट दिया। एक समूह में केवल भारतीय विद्यार्थी थे। इस समूह को ओबामा ने अपने पास बैठाया। दूसरे समूह ने उनसे जब सवाल पूछा कि अमेरिका को आगे ले जाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, ओबामा ने कहा, दिल लगाकर पढ़ो, वर्ना इस समूह का हरेक बच्चा तुमसे आगे निकल जायेगा। आज अमेरिका को आगे ले जाने की जिम्मेवारी भारतीय संभाल रहे हैं और अमेरिकी नागरिकों को यह सिलसिला तोड़ने में अभी कई साल लगेंगे।

बराक ओबामा की यह बात आज पूरी तरह सही साबित हो रही है। भारत में पले-बढ़े और पढ़े पराग अग्रवाल को ट्विटर का सीइओ नियुक्त किये जाने के बाद से साफ हो गया है कि भारतीय प्रतिभा की चमक को अब दबा कर नहीं रखा जा सकता है। केवल पराग ही नहीं, भारत में जन्मे कई लोगों ने दुनिया भर में अपने हुनर और प्रतिभा का लोहा मनवाया है।

37 वर्षीय आइआइटी-बांबे और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र पराग अग्रवाल पहले भारतवंशी नहीं हैं, जिन्होंने किसी अमेरिकी कंपनी की दिग्गज टेक कंपनी की कमान संभाली है। पराग 2011 में ट्विटर से जुड़ने से पहले माइक्रोसॉफ्ट, याहू और एटीएंडटी लैब में काम कर चुके हैं। वह गूगल के सीइओ सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सीइओ सत्य नडेला, एडोबी के सीइओ शांतनु नारायण की सूची में शामिल हैं। इनके अलावा आइबीएम के अरविंद कृष्णा, फ्लेक्स की सीइओ रेवती अद्वैती, एरिस्टा नेटवर्क की जयश्री उलाल, पालो आॅल्टो नेटवर्क्स के निकेश अरोड़ा, वीमियो की अंजली सूद, और गोडैडी के अमन भुटानी का नाम प्रमुख है।

संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रपट में कहा गया है कि दुनिया के विभिन्न देशों में 3.80 करोड़ भारतीय प्रवास कर रहे हैं। इनमें करीब 20 लाख वे लोग शामिल नहीं हैं, जो फिजी से सूरीनाम तक फैले दो सौ देशों में पिछले सौ-डेढ़ सौ साल से वहीं के होकर रह गये हैं। इस तरह दुनिया भर में भारतीय प्रवासियों की संख्या चार करोड़ के करीब हो जाती है। यातायात की सुविधाएं जब से बढ़ी हैं और तकनीक के विकास ने दुनिया को छोटा कर दिया है। लगभग सभी देशों में प्रवासियों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो गयी है। आज से 50 साल पहले विदेशी धरती पर हिंदी बोलने और समझनेवाले बड़ी मुश्किल से मिलते थे, लेकिन आज दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां भारतीय नहीं हों। आज आॅस्ट्रेलिया से अर्जेंटीना तक दुनिया के किसी भी महाद्वीप में भारतीय लोग कहीं भी दिख जायेंगे। पिछले 20 साल में एक करोड़ भारतीय विदेशों में जाकर बस गये हैं। अमेरिका, यूरोप और सुदूर पूर्वी देशों में तो प्राय: पढ़े-लिखे लोग जाते हैं और अरब देशों में मेहनतकश लोग। सब मिला कर ये भारतीय सालाना पांच लाख करोड़ रुपये भारत भेजते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि विदेशों में रहनेवाले भारतीय हर जगह अपना दबदबा कायम कर रहे हैं। प्रवासी भारतीयों का एक गुण, जो हर जगह प्रशंसा पाता है, वह यह है कि ये भारतीय स्थानीय संस्कृति से पूरा तालमेल बिठाने की कोशिश करते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति उनकी नस-नस में बसी होती है। वे भारत में नहीं रहते, लेकिन भारत उनमें रहता है। वे उन देशों के लोगों के लिए बेहतर जीवन-पद्धति का अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करते हैं। और यदि बात दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका की करें, तो यहां की दिग्गज कंपनियों की कमान भारतवंशियों के हाथों में है। प्रशासन से लेकर तकनीकी दुनिया में भारतवंशियों का जो डंका बज रहा है, उसकी अनुगूंज एक बार फिर पराग अग्रवाल की नियुक्ति के रूप में सुनाई दी है। लेकिन सवाल यह उठता है कि ये प्रतिभाएं भारत में अपनी चमक क्यों नहीं बिखेर पातीं। भारत में उनके लिए अवसर नहीं हैं या फिर प्रतिभा पलायन के लिए दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश अभिशप्त है। इसका सवाल नकारात्मक है। भारत में न तो अवसरों की कमी है और न प्रतिभा पलायन यहां के लिए अभिशाप है। यह समस्या जरूर है। लेकिन असली समस्या भारत के प्रति दुनिया का नजरिया है। दुनिया, खास कर पश्चिम के देश भारत को महज सांपों और जादू-टोनों का देश मानते हैं। इसलिए भारत में चाहे कितने भी बड़े काम क्यों न हों, उन्हें नोबेल पुरस्कार जैसी अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिलती। पराग अग्रवाल की नियुक्ति के बाद अब भारत के प्रति दोयम दर्जे का नजरिया रखनेवालों को जवाब देना ही होगा।

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