द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा कूटनीतिक अध्याय लिखा भारत ने

गाथा : 1971 के युद्ध ने दुनिया के सीने पर भारतीय पराक्रम का इतिहास लिखा

50 साल, यानी आधी शताब्दी हो गये, जब भारतीय पराक्रम ने दुनिया के सीने पर अपनी अमिट कहानी दर्ज की थी और बांग्लादेश के रूप में नये राष्ट्र का उदय हुआ था। यह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा कूटनीतिक अध्याय था, जिसे भारतीय सेना ने अपने रणनीतिक कौशल और पराक्रम के बल पर रचा था। भारत ने 1971 के युद्ध में 13 दिन के भीतर जिस बहादुरी और कुशलता से पाकिस्तान को धूल चटायी थी, उसने दुनिया को पूर्व की इस ताकत की झलक दिखा दी थी, जिसे भारत कहा जाता है। तब से लेकर आज तक बीते 50 सालों में दुनिया में बहुत कुछ बदला है और भारत और पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश ने भी कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत और यहां तक कि बांग्लादेश ने इन 50 सालों में जहां प्रगति की राहें तय की हैं, वहीं पाकिस्तान आज भी उसी स्थिति में है, जिसमें हर तरफ से उसे दुत्कार ही मिलती है। पाकिस्तान की यह स्थिति बताती है कि किसी भी देश-समाज को आगे बढ़ने के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के विजय पर्व के 50 वर्ष पूरा होने के मौके पर उस युद्ध से जुड़ी यादों और उनके असर को समेटती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।

भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर दो बार युद्ध हुआ-1947-48 और 1965 में। उसके बाद फिर एक और युद्ध 1971 में हुआ, जो महज 13 दिनों तक चला। भारत ने इस युद्ध में पाकिस्तान को औंधे मुंह पटक कर धूल चटा दी। पाकिस्तान हार गया। इसका परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान का पूर्वी भाग उससे अलग हो गया, जिसे आज बांग्लादेश के तौर पर जाना जाता है। आज भारत पाकिस्तान के साथ हुए 1971 की जंग में जीत के 50 वर्ष पूरे होने की उपलब्धि पर विजय दिवस मना रहा है। इस युद्ध में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था। 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुई इस जंग में भारत ने कई कूटनीतिक आयाम भी तय किये। यह इतिहास में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण माना जाता है। भारतीय सेना की जांबाजी के आगे पाकिस्तानी सेना ने महज 13 दिन में ही घुटने टेक दिये थे। आधुनिक और मध्यकालीन दुनिया में इतना बड़ा आत्मसमर्पण अब तक कभी भी देखने या पढ़ने को नहीं मिला है। पाकिस्तान को मिली करारी हार के बाद उस समय के पूर्वी पाकिस्तान, जिसे वर्तमान में बांग्लादेश कहते हैं, को पाकिस्तान के चंगुल से आजाद करा दिया गया। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने भारत की पूर्वी कमान के सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। शाम के साढ़े चार बजे भारतीय सेना की पूर्वी कमान के सैन्य कमांडर लेफ्टिनेट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा हेलीकॉप्टर से ढाका पहुंचे। यहां नियाजी और जगजीत सिंह अरोड़ा अगल-बगल एक टेबल के सामने बैठे। इस दौरान नियाजी आत्मसमर्पण के लिए दिये गये दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहे थे। नियाजी ने अपनी बेल्ट-मेडल और रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दी और पूरी पाकिस्तानी सेना ने भी ऐसा ही किया। इसी दौरान नियाजी की आंखों में आंसू आ गये थे। बता दें कि पाकिस्तानी नियाजी के इस आचरण को कायर की संज्ञा दे रहे थे और उनकी हत्या पर उतारू थे, लेकिन भारतीय सेना ने यहां नियाजी की जान भी बचायी।

कैसे अस्तित्व में आया बांग्लादेश
पूर्वी पाकिस्तान में शुरू हुआ पाकिस्तानी सेना का अत्याचार लगातार बढ़ता जा रहा था। मार्च 1971 में तो पाकिस्तानी सेना ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थीं। पूर्वी पाकिस्तान की आजादी की मांग करनेवाले लोगों को बेरहमी से मारा जाने लगा। महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसी घटनाएं आम हो गयी थीं। हर दिन खून की होली खेली जा रही थी। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को खुली हवा में सांस लेना भी दूभर हो गया था। ऐसे में पूर्वी पाकिस्तान से भागकर भारत आनेवाले शरणार्थियों की संख्या बढ़ने लगी और भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने के दबाव में भी इजाफा हो गया। बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के समय ‘मुक्ति वाहिनी’ का गठन पाकिस्तानी सेना के अत्याचार के विरोध में किया गया था। 1969 में पाकिस्तान के तत्कालीन सैनिक शासक जनरल अयूब खान के खिलाफ ‘पूर्वी पाकिस्तान’ में असंतोष बढ़ गया था। बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान के आंदोलन के दौरान 1970 में यह अपने चरम पर था। ऐसे में मार्च 1971 के अंत में भारत सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति वाहिनी की मदद करने का फैसला कर लिया। दरअसल, मुक्ति वाहिनी पूर्वी पाकिस्तान के लोगों द्वारा तैयार की गयी सेना थी, जिसका मकसद पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराना था। 31 मार्च, 1971 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय संसद में इस संबंध में अहम एलान किया। 29 जुलाई, 1971 को भारतीय संसद में सार्वजनिक रूप से पूर्वी बंगाल के लड़ाकों की मदद करने की घोषणा की गयी। हालांकि, इसके बाद भी कई महीने तक दोनों देशों के बीच शीत युद्ध चलता रहा। 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान ने भारत के कई शहरों पर हमला किया, तो भारत को भी युद्ध का एलान करना पड़ा। महज 13 दिन बाद यानी 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ ही दुनिया के नक्शे पर नया देश बांग्लादेश बन गया।

जब अमेरिका पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आया
भारत-पाक युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया, जब अमेरिका पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आ गया था। अमेरिका ने जापान के करीब तैनात अपनी नौसेना के सातवें बेड़े को पाकिस्तान की मदद करने के लिए बंगाल की खाड़ी की ओर भेज दिया था। इसके पीछे का कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन और भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच संबंधों का अच्छा न होने को भी बताया जाता था। 1971 के समय अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध काफी मजबूत माने जाते थे। अमेरिका ने पाकिस्तान को कई अत्याधुनिक हथियार दिये थे। पाकिस्तानी नौसेना की पीएनएस गाजी भी अमेरिका द्वारा निर्मित एक अत्याधुनिक पनडुब्बी थी। इसे भारत के विमानवाहक युद्धपोत आइएनएस विक्रांत को तबाह करने के लिए भेजा गया था। हालांकि, भारतीय नौसेना ने इसे विशाखापत्तनम के पास डुबो दिया था और पाकिस्तानी नौसेना की कमर तोड़ दी थी। अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े में यूएसएस एंटरप्राइज नामक परमाणु हथियारों से लैस विमानवाहक युद्धपोत और अन्य विध्वंसक पोत आदि शामिल थे। इस बेड़े को उस समय दुनिया के सबसे शक्तिशाली नौसैनिक बेड़ों में से एक माना जाता था। यूएसएस एंटरप्राइज बिना दोबारा ईंधन की जरूरत के दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की क्षमता रखता था। यह भारत के विमानवाहक युद्धपोत आइएनएस विक्रांत के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा था। अमेरिका ने इस बेड़े को बंगाल की खाड़ी में भेजने के पीछे बांग्लादेश में फंसे अमेरिकी नागरिकों को बाहर निकालना बताया था। हालांकि, आगे चलकर यह बात सामने आयी कि इस बेड़े का मकसद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध लड़ रही भारतीय सेना पर दबाव बनाना था।

कैसे रूस ने की भारत की मदद?
अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े के भारत की ओर बढ़ने की खबर के बाद भारत ने रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) से मदद मांगी थी। युद्ध शुरू होने के कुछ महीने पहले ही भारत ने रूस के साथ सोवियत-भारत शांति, मैत्री और सहयोग संधि की थी। अमेरिकी नौसेना को बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ता देख कर रूस ने भारत की मदद के लिए अपनी परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बी और विध्वंसक जहाजों को प्रशांत महासागर से हिंद महासागर की ओर भेज दिया।

जब पाकिस्तानी सेना ने भारत के आगे घुटने टेक दिये
अमेरिका का सातवां बेड़ा जब तक पाकिस्तान की मदद करने के लिए बंगाल की खाड़ी में पहुंच पाता, उससे पहले ही 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने भारत के सामने घुटने टेक दिये और आत्मसमर्पण कर दिया। हालांकि, रूस की नौसेना ने सातवें बेड़े का पीछा तब तक नहीं छोड़ा, जब तक वह वापस नहीं लौट गया।

यह महज एक विजय नहीं, कूटनीतिक अध्याय था
पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण, बांग्लादेश का निर्माण और भारत की जीत इस यु्द्ध का महज एक परिणाम नहीं था, बल्कि दुनिया के कूटनीतिक इतिहास का एक अध्याय था। इसके बाद ही दुनिया में भारत की ताकत का विस्तार हुआ और भारतीय उपमहाद्वीप की एक महाशक्ति के रूप में भारत को मान्यता मिली। लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि उस हार ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी। वह आज भी उस पराजय को भूल नहीं सका है, क्योंकि वह आज भी वहीं खड़ा है, जहां 50 साल पहले था। दूसरी तरफ भारत और यहां तक कि बांग्लादेश उससे मीलों आगे निकल चुके हैं। यह साबित करता है कि खुंटचालों से जीत का आभास हो सकता है, लेकिन बाद में उसका परिणाम पराजय ही होती है। उस युद्ध ने भारतीय जवानों के अदम्य साहस, रणनीतिक युद्ध कौशल और देश के प्रति मर-मिटने के जज्बे को दुनिया के सामने रखा। आज पचास साल बाद भी हर भारतीय सेना की उस शौर्य गाथा पर गौरवान्वित है और पूरा देश विजय दिवस मना रहा है।

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