कहानी उस पिता की, जिसने झारखंड के लिए अपने बेटे को कुर्बान कर दिया

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो,
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को,
नर हो, न निराश करो मन को।

हिंदी के प्रख्यात कवि मैथिली शरण गुप्त ने बहुत पहले यह लिखा था, जिसे झारखंड की राजनीति के एक पुरोधा बाबूलाल मरांडी ने कंठस्थ कर लिया है।

दरअसल बाबूलाल मरांडी झारखंड की वह संपदा हैं, जिसका बार-बार दोहन हुआ, लेकिन उसके राजनीतिक चेहरे पर चमक आज भी बरकरार है। झारखंड का एक ऐसा राजनीतिक शख्स, जिसकी सादगी उसकी वाणी से भी झलकती है। राजनीति के थपेड़ों के बीच उनका जीवन गिरता-उफनता रहा है। वह राजनीति के कठोर झंझावातों से होकर गुजरे हैं। उनके चेहरे पर हर समय मुसकान तो दिखती है, लेकिन उसके पीछे कई दर्द की शृंखला भी है। जीवन में संघर्ष की एक ऐसी लौ, जो आज भी धधक रही है। झारखंड को अव्वल बनाने की चाहत ने उनसे कई बलिदान भी लिये हैं। बाबूलाल मरांडी शुरू से ही पार्टी और संगठन को मजबूत बनाने में विश्वास रखते रहे हैं। निर्णय के मामले में वह अड़ियल भी हैं, जिद्दी भी। इसी कारण उनके कुछ करीबी उनसे गुस्साये रहते हैं, तो उन्हें ना चाहनेवाले अचंभित भी रहते हैं। जब बाबूलाल मरांडी के हाथ में झारखंड भाजपा के अध्यक्ष पद की कमान थमायी गयी थी, तो उन्होंने एक सूत्र वाक्य पर काम किया। आगे उसे ही बढ़ाओ, जो डिजर्व करता हो। टिकट उसे दो, जो चुनाव जीत सके। राजनीति में अपना-पराया नहीं चलता। कोई उनका विरोधी है, और अगर वह चुनाव जीत सकता है, पार्टी को मजबूती प्रदान कर सकता है, उसे टिकट मिलना ही चाहिए, उसे आगे बढ़ना ही चाहिए। बाबूलाल गलत को गलत और सच को सच बोलनेवाले व्यक्ति हैं। उनके आसपास अगर कुछ गलत हो रहा है, तो उसे बोलने में वह नहीं हिचकते कि यह गलत हो रहा है। इसके चलते कई लोग उनके आलोचक भी बन जाते हैं। बाबूलाल ने झारखंड के लिए अपना बेटा कुर्बान कर दिया, फिर भी कहते हैं, हमने तो एक ही बेटा खोया है, उस दिन और उन्नीस लोग मारे गए थे। 62 साल की उम्र में भी अपने संघर्षों, कड़ी मेहनत और राजनीतिक तपस्या की बदौलत वह ऊर्जा से लबरेज हैं। उनकी फुर्ती देख कर आप कह सकते हैं 42 साल का नौजवान। बाबूलाल मरांडी एक ऐसे नेता हैं, जिनमें झारखंड के कोने-कोने की माटी की सुगंध समायी हुई है। उसी माटी की सुगंध और उनकी संघर्ष गाथा को जानने पहुंचे आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह समय से बीस मिनट पहले पहुंचने पर भी उन्होंने देखा कि वह पहले से ही तैयार बैठे हैं। समय के पाबंद क्या कहें, समय से पहले चलनेवाली शख्सियत का नाम है बाबूलाल। आइये आज बाबूलाल की जीवन की खिड़की जरा खोलते हैं।

बातचीत का सिलसिला शुरू होता है। कहते हैं: देखिये, हम तो ठेठ गंवई परिवेश से आये हैं। आज की तारीख में भी झारखंड का एक सुदूर जिला है गिरिडीह। यह जिला बिहार की सीमा से सटता है। यहां से बिहार के जमुई क्षेत्र की दूरी मात्र पांच-सात किलोमीटर है। इसी गिरिडीह जिले के तिसरी ब्लॉक के कोदाईबांक गांव में हमारा जन्म हुआ, 11 जनवरी 1958 को। हमारे माता-पिता एक सामान्य किसान परिवार से रहे हैं, पूरी तरह खेती पर ही आश्रित थे। कोई बिजनेस या नौकरी नहीं थी। खेती से ही सबका साल भर भरण-पोषण होता था। कपड़ा-लत्ता सब उसी से होता था।

सवाल : शिक्षा को लेकर कोदाईबांक का माहौल कैसा था। क्या वहां के लोगों में पढ़ने के प्रति रुचि थी?
जवाब : देखिये, हमारे जन्म के बाद ही गांव में प्राइमरी स्कूल खुला। सरकार द्वारा संचालित विद्यालय था। प्राथमिक विद्यालय में हमने एक जगह नहीं, दो-तीन जगह थोड़ी-थोड़ी पढ़ाई की थी। हमारे गांव के पूरब साइड में एक गांव था सिरसिया। दो-तीन साल तक हम यहां-वहां पढ़ते रहे। फिर सिरसिया गांव के बाद बगल के खोरो गांव में हम गये। हमारे गांव से उत्तर-पूरब में एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है खोरो। क्लास वन से क्लास थ्री तक हम आसपास के तीन गांवों के तीन विद्यालय में पढ़े। उसके बाद हमने मिडिल स्कूल में दाखिला लिया क्लास फोर से। क्लास फोर से क्लास सेवेन तक चंदौरी मिडिल स्कूल में हमने पढ़ाई की। कोदाईबांक से चंदौरी मिडिल स्कूल की दूरी साढ़े चार किलोमीटर थी। इसी स्कूल से हमने मिडिल तक की पढ़ाई पूरी की। फिर गांव से पांच किलोमीटर की दूरी पर था हाइस्कूल। स्कूल का नाम था तिसरी बरमसिया। उस समय टेंथ नहीं, हायर सेकेंडरी होती थी। मैट्रिक एग्जाम मैंने वहीं से पास किया। उसके बाद फिर हमने गिरिडीह कॉलेज में कदम रखा।

सवाल : कॉलेज की पढ़ाई आपने क्या सब्जेक्ट लेकर की?
जवाब : सब्जेक्ट मेरा सिंपल था-पालिटिकल साइंस, ज्योग्राफी और हिस्ट्री।

सवाल : राजनीति में आने की इच्छा आपके मन में कैसे जगी? आप आरएसएस से कैसे जुड़ गये?
जवाब : जिस समय मैं हाइस्कूल में पढ़ रहा था, उसी समय मैंने आरएसएस का नाम सुना था। संघ की शाखा में जो लोग जाते थे, उनसे मेरा संपर्क था। चूंकि हम गांव में थे, इसलिए हम जानते थे कि ये लोग संघ के स्वयंसेवक हैं। लेकिन जब हम कॉलेज आये, तब मेरा संपर्क संघ से बढ़ गया। गांव में रह कर शाखा में जाना इसलिए संभव नहीं था, क्योंकि शाखा गांव से दूर लगती थी। उस समय गांव में आने-जाने के लिए रास्ता भी नहीं था, तो वहां शाखा कैसे लगती। लेकिन जब कॉलेज गये, तो फिर एक प्रकार से नियमित रूप से शाखा में आना-जाना होने लगा। जिस वक्त हम कॉलेज में पढ़ रहे थे, उस समय अशोक सिंघल जी के आह्वान पर पूरे देश में एकात्मता यात्रा निकली थी। वर्ष 1983 में गंगा जल लेकर यह यात्रा भारत वर्ष के कोने-कोने में जा रही थी। गिरिडीह में विश्व हिंदू परिषद का जो कार्यालय था, उसने यात्रा निकालने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी थी। इस प्रकार एकात्मता यात्रा के समय हम पूरी तरह से संघ से जुड़ गये।

सवाल : संघ से जुड़ने के पहले आप क्या करते थे?
जवाब : वर्ष 1981 में इंटर पास करने के बाद हमने एक साल तक शिक्षक की नौकरी की, प्राइमरी स्कूल में। यह प्राइमरी स्कूल गिरिडीह जिला के देवरी ब्लॉक में था। वहां एक महतो धड़ांग गांव था। उसी गांव में स्कूल था, जहां हम एक साल तक शिक्षक रहे।
सवाल : आपके माता-पिता की दिली इच्छा क्या थी?
जवाब : माता-पिता चाहते थे कि हम पढ़-लिख कर नौकरी करें। उससे अधिक और उनकी कोई चाहत नहीं थी। परिवार की जो दीन दशा थी, उसमें माता-पिता यही सोचते थे कि हम पढ़-लिख कर नौकरी करें और घर गृहस्थी की गाड़ी खींचने में मदद करें।

सवाल : आप लोग कितने भाई-बहन हैं?
जवाब : हम चार भाई और दो बहन। वैसे तीन बहनें थीं, जिनमें एक बहन पहले ही गुजर गयी थी। हम भाइयों में सबसे बड़े थे।

सवाल : आपको नौकरी की सख्त जरूरत थी। मास्टर की नौकरी मिलने पर एक साल बाद आपने उसे छोड भी दी। कारण?
जवाब : देखिये, शिक्षक की नौकरी के दरम्यान एक घटना ने मुझे अंदर से हिला कर रख दिया। सरकार से हमारी तनख्वाह बैंक में भेज दी जाती थी। हम वहीं से पैसा उठाते थे। कई बार ऐसा हुआ, जब बैंक अधिकारी ने कहा कि आप लोगों का पैसा तो बैंक में आ जाता है, लेकिन एकाउंट नंबर वहां से नहीं भेजा जाता। इससे हमें दिक्कत होती है। इसके बाद हम इंस्पेक्टर के पास गये। वहां बताया गया कि हम तो एकाउंट नंबर भेज देते हैं। मेरे सामने उन्होंने अगले महीने की डिटेल्स भेजी। लिफाफे में उन्होंने बैंक एकाउंट नंबर के साथ डिटेल्स भेजी। इसके बाद हम एक दिन उस आॅफिस में चले गये, जहां से हम लोगों की तनख्वाह की डिटेल्स बैंक में भेजी जाती थी। वहां पर एक डिलिंग क्लर्क था। हम उसके सामने खड़े हो गये। मैंने उससे कहा कि हमें आपसे कुछ काम है। उसने एक बार मुझे देखा और फिर काम करने लगा। मैंने दुबारा उससे कहा कि मैं आपके ही पास आया हूं। उसने फिर देखा और इधर-उधर देखने लगा। तीसरी बार जब मैंने कहा तो, वह बोला-क्या काम है। हमने उसने पूछा कि आप हमारा एकाउंट नंबर बैंक में क्यों नहीं भेजते। इसके बाद वह अचानक मेरे साथ मिसबिहैव कर बैठा। उसने एक ऐसी बात बोल दी, जो हमें अच्छी नहीं लगी। हमने उसे टोका कि आप तो बदतमीज की तरह बात करते हैं। हमने कहा कि हम नौकरी करते हैं और आपको कुछ भी नहीं करना होता है, सिर्फ एकाउंट नंबर लिख कर भेज देना है, वह भी आप नहीं भेजते। उस आॅफिस की स्थिति विचित्र थी। अफसर तो छोड़ दीजिए, चपरासी तक यह बताने को तैयार नहीं होता था कि किस ब्लॉक का डिटेल्स कौन क्लर्क भेजता है। अगर चपरासी बता भी दे, तो क्लर्क ठीक से बात नहीं करता था। इसके बाद हमको लगा कि अब हमें यहां नौकरी नहीं करनी चाहिए। उसी समय मेरे दिमाग में आया कि कंपटीशन की तैयारी करके हम अफसर बन कर आयें और ऐसे लोगों को दंडित करें। उसके बाद ही हमने शिक्षक की नौकरी छोड़ दी। फिर हम विश्व हिंदू परिषद के आॅल टाइमर के रूप में काम करने निकल पड़े। इस दरम्यान हम कंपटीशन की तैयारी भी करते थे। लेकिन तैयारी कहां हो पा रही थी। उस समय राम मंदिर आंदोलन चरम पर था। विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में राम मंदिर का आंदोलन और तीव्र होता चला गया। फिर हम उस आंदोलन में इतना डूब गये कि समय नहीं मिलता था, कोई और काम करने के लिए। उस समय जिम्मेदारी इतनी अधिक थी कि कभी हम संथाल परगना चले जाते थे, तो कभी छोटानागपुर। पलामू और रांची प्रमंडल के हिस्से को छोड़ दिया जाये, तो करीब-करीब हमने सब क्षेत्र को देख लिया था। लगातार दौरा होता रहता था।

सवाल : शुरूआती दौर में राजनीति में आपको किसका साथ मिला, जिसने आपको मोटिवेट भी किया?
जवाब : उस समय प्रांत प्रचारक थे शिवशंकर तिवारी। उनसे अच्छे संबंध हो गये थे। उस समय सह प्रांत प्रचारक ओमप्रकाश गर्ग जी थे। संघ के प्रचारकों का दौरा चल रहा था। उसी दौरे में ओमप्रकाश जी आये हुए थे। एक बैठक में मैं भी उपस्थित था। उसमें उन्होंने मेरा परिचय पूछा। हमने बताया कि हम कॉलेज में पढ़ते हैं। फिर हमसे पूछा कि पढ़-लिख कर क्या करोगे? तो हमने उनको बताया कि नौकरी करेंगे। फिर उन्होंने पूछा कि पढ़-लिख कर काम क्यों करना चाहते हो? हमने कहा कि हमें पैसे की जरूरत है। उन्होंने एक उद्यमी शक्ति चरण तरवे का नाम लिया। उनकी कमलपत राम के नाम से फर्म थी। वह संघ के पदाधिकारी भी थे। संभवत: नगर संचालक थे। वह माइका के बड़े व्यापारी थे। गर्ग जी ने हमने पूछा कि कमलपत राम फर्म के मालिक कितना पढ़े-लिखे हैं। हमने कहा कि हमको तो नहीं पता। वह बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनके पास बहुत पैसा था। एक प्रकार से वे नगर सेठ ही थे। ओमप्रकाश जी बोले कि कम पढ़-लिख करके भी जब कोई इतना पैसा कमा सकता है, तो इतना पढ़-लिख करके क्या करना? मुझे बात तो थोड़ी-थोड़ी समझ में आ ही रही थी कि ये तो ठीक ही बोलते हैं। जब कम पढ़-लिख करके वे इतना पैसा कमा रहे हैं, तो फिर हम इतना पढ़ कर क्या करेंगे। फिर उन्होंने कई महापुरुषों के नाम लिये, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था खासकर सिदो-कान्हू, बिरसा मुंडा। कहा कि इन लोगों को आप जानते हैं। हमने कहा कि हां हम जानते हैं। उन्होंने फिर पूछा कि ये लोग कितना पढ़े-लिखे थे? उस समय तो पढ़ने-लिखने की सुविधा भी नहीं थी। उन्होंने कहा कि देखो इन लोगों ने देश और समाज के लिए कितना काम किया। फिर उन्होंने कहा कि सब लोग परिवार के लिए तो काम करता ही है, कुछ लोगों को तो देश और समाज के लिए काम करना चाहिए। धीरे-धीरे मेरे मन में एक बात तो आ गयी कि वह बात तो ठीक ही बोलते हैं कि परिवार के लिए तो सब लोग ही काम करते हैं।

हम ग्रेजुएशन करके 1983 में रांची आये, तो प्रांत प्रचारक शिवशंकर तिवारी जी ने एक चिट्ठी दी और कहा कि संथाल परगना चले जाओ। हमने परीक्षा दी थी, रिजल्ट आया नहीं था। उन्होंने कहा कि जब तक रिजल्ट नहीं आता है, तब तक काम करो। फिर उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के संगठन मंत्री के रूप में हमें दुमका भेज दिया। दुमका में हमें काम मिल गया। हम काम करने लगे। चूंकि गिरिडीह कॉलेज का रिजल्ट नहीं आया था, बाकी कॉलेजों का रिजल्ट निकल गया था। गिरिडीह कॉलेज के छात्रों ने बदमाशी की थी, इसलिए एक सब्जेक्ट का रिजल्ट कैंसिल कर दिया गया। फिर उस सब्जेक्ट की परीक्षा का आदेश हुआ। रांची कॉलेज में हम लोगों का सेंटर पड़ा। हम रांची आये और परीक्षा दी।

सवाल : ग्रेजुएशन के बाद क्या आपने पढ़ाई छोड़ दी?
जवाब : जब ग्रेजुएशन का रिजल्ट आया, तो फिर हमारी इच्छा हुई कि हम पीजी करें। हमने प्रांत प्रचारक शिवशंकर तिवारी जी को भी अपनी इच्छा बतायी। लेकिन हमारा नंबर थोड़ा कम हो रहा था। यहां रांची यूनिवर्सिटी में एडमिशन में थोड़ी प्रॉब्लम हो रही थी। उस समय रांची यूनिवर्सिटी के पीजी विभाग के एचओडी थे वीसी शर्मा। वे कांके में रहते थे। शिवशंकर तिवारी जी ने उनसे समय लिया और उनके पास रिक्शा में बैठा कर हमको ले गये। उन्होंने उनसे कहा कि ये पीजी में पढ़ना चाहते हैं, इनका एडमिशन लेना है। फिर एचओडी ने सर्टिफिकेट वगैरह देखा। नंबर थोड़ा कम था। उन्होंने कहा कि रांची में एडमिशन हो सकता है, इसके लिए विकलांग सर्टिफिकेट बनाना पड़ेगा। हमने कहा कि हम तो विकलांग है ही नहीं। उन्होंने कहा कि विकलांग तो हाथ से भी होता है, पैर से भी होता है। आंख से भी होता है, कान से भी होता है। यह हमको अच्छा नहीं लगा। हमने सोचा कि यह तो रिकार्ड में रह जायेगा, जबकि हम तो स्वस्थ हैं। हमने शर्मा जी से कहा कि यह तो हम नहीं करेंगे। उसके बाद उन्होंने कहा कि एक उपाय है, रांची में तो नहीं हो पायेगा, सिमडेगा में नया पीजी खुला है, वहां आप एडमिशन ले लीजिए, फिर बाद में रांची में ट्रांसफर हो जायेगा। यह बात हमें जंची। हमने सोचा कि झूठा विकलांग सर्टिफिकेट बनाने से अच्छा है कि हम सिमडेगा में एडमिशन ले लें। हमने एडमिशन ले लिया। एक साल क्लास भी किये, लेकिन पीजी पूरा नहीं कर पाये। राममंदिर निर्माण के आंदोलन में अत्यधिक भागीदारी के कारण हम पीजी की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाये।

सच को सच और गलत को गलत कहने का माद्दा रखते हैं बाबूलाल

सवाल : आपकी एंट्री भाजपा में कैसे हुई?
जवाब : वर्ष 1990 में तय हुआ कि कुछ लोगों को संघ से बीजेपी में लगाया जाये। हो सकता है, बीजेपी ने संघ से कहा होगा कि जो होल टाइमर हो, पार्टी के लिए काम करे। फिर शिवशंकर तिवारी मुझे लेकर पटना कार्यालय गये और वहां पर कैलाशपति मिश्र से मेरी पहली दफा मुलाकात हुई। एक प्रकार से कह सकते हैं कि हमें उनके जिम्मे लगा दिया गया कि आपको बीजेपी में काम करना है। फिर हम संघ कार्यालय से भाजपा आॅफिस गये। संथाल परगना के सह संगठन मंत्री के रूप में। उस समय दुर्गा दास राठौर संथाल परगना के संगठन मंत्री थे। उनके सहयोगी के रूप में मुझे भेजा गया। फिर काम तो वैसे ही चलता रहा। फिर 1991 में लोकसभा का चुनाव आया। उस समय ताराकांत झा भाजपा के अध्यक्ष हुआ करते थे। उस समय पार्टी ने तय करके हमें दुमका से लोकसभा का चुनाव लड़ा दिया। फिर तो हम पार्टी में चलते ही चले गये। 1991 में हम पहला चुनाव लड़े। वोट तो ठीकठाक आया, लेकिन हम चुनाव हार गये। वहां जेएमएम यानी शिबू सोरेन और भाजपा की सीधी फाइट थी, लेकिन वोट का अंतर काफी था। उसके बाद हम पांच साल तक लगातार वहीं काम करते रहे। इस बीच पार्टी में भी बीच-बीच में कई अन्य जिम्मेदारी मिली। कुछ दिनों तक हम बिहार प्रदेश में पार्टी के मंत्री भी रहे। फिर कुछ दिनों के लिए हमें जनजातीय मोर्चा का अध्यक्ष भी बनाया गया था। हालांकि उसमें हमने बहुत कोई एक्टिव काम नहीं किया।

जब भाजपा ने तय किया कि झारखंड में वनांचल भाजपा नाम से एक अलग इकाई गठित की जाये। इसे लेकर हजारीबाग में हम लोगों की मीटिंग हुई थी। यह 1991-96 के बीच की बात है। कैलाशपति मिश्र इसे देख रहे थे। इस क्षेत्र में उस समय समरेश सिंह, रुद्रप्रताप षाड़ंगी, इंदरसिंह नामधारी वगैरह बड़े नेता के रूप में जाने जाते थे। हमको याद है कि हजारीबाग की मीटिंग में सब लोगों से बातें हुर्इं। वहां मीटिंग करके, सब लोगों से राय-विचार करके कैलाशपति मिश्र पटना चले गये। पटना से उन्होंने वनांचल प्रदेश के अध्यक्ष के रूप में हमारे नाम की घोषणा कर दी। उस समय बड़ी अजूबा कमेटी बन गयी थी। अजूबा मतलब हमारे साथ जो उपाध्यक्ष लोग थे, सीनियर-सीनियर थे। कहां रुद्रप्रताप षाड़ंगी, कहां समरेश सिंह वगैरह। तो जैसा अमूमन होता है, हम अध्यक्ष थे और सीनियर लोग उपाध्यक्ष थे, तो उन लोगों को हमें डायजेस्ट करने में थोड़ी प्राब्लम थी। उस समय मुझे काफी मुश्किल हुई, फिर भी काम करते-करते कमेटी को आगे बढ़ाया। फिर 1996 में हमने दोबारा लोकसभा चुनाव लड़ा। उस समय मैं पांच-छह हजार वोट से शिबू सोरेन से हार गया।

सवाल : हार तो आपको मिली, लेकिन बहुत कम वोट से। क्या आपको यह नहीं लगता कि यह वही दौर था, जब भाजपा में आपका वजन बढ़ गया?
जवाब : हां, जब चुनाव में कम वोट का अंतर हो गया, तो स्वाभाविक है कि पार्टी के वर्कर्स में आशा का संचार हुआ और अपोजिशन में भी थोड़ी दहशत हुई। उस चुनाव में पचपन सौ या 54 सौ वोट से हम पराजित हुए थे, तो लोगों को लगा कि निकट भविष्य में हम जीत सकते हैं। उसके बाद केंद्र की सरकार बहुत दिनों तक चली नहीं। फिर 1998 में चुनाव हो गया। उस चुनाव में हम जीत गये। इस चुनाव में बाबूलाल मरांडी ने शिबू सोरेन को हरा अपना लोहा मनवा लिया। केंद्र में अटल जी की सरकार बनी, लेकिन वह सरकार 13 दिन में ही गिर गयी। उस सरकार में हम वन पर्यावरण राज्यमंत्री बने थे। उसके बाद 1999 में फिर चुनाव हुआ। उस चुनाव में शिबू सोरेन नहीं लड़े। उनकी पत्नी रूपी सोरेन जी चुनाव मैदान में थीं। उस समय भी हम जीते और अटल जी की सरकार में मुझे वन पर्यावरण राज्यमन्त्री बनाया गया। इसी बीच 2000 में अलग राज्य की घोषणा हो गयी और हम मुख्यमंत्री बने।

सवाल : झारखंड के निर्माण में आपकी भूमिका क्या रही, उसे मैं आपके मुंह से ही जानना चाहता हूं?
जवाब : अलग राज्य का आंदोलन तो झारखंड में वर्षों से चल रहा था। उस समय भाजपा के जो अखिल भारतीय स्तर पर काम देख रहे थे, वे गोविंदाचार्य थे। जैसा हमने पहले कहा कि शुरू में बिहार का काम देख रहे थे कैलाशपति मिश्र और अश्विनी कुमार जी। संघ कार्यालय में शिवशंकर तिवारी जी के साथ हमें बुलाया गया और फिर कैलाशपति मिश्र से हमारी भेंट करायी गयी। उसके बाद हमें बताया गया कि अब आपको इनके साथ काम करना है। ये जहां आपको काम में लगायेंगे, उसे करना है। उस समय मन में थोड़ा अटपटा सा लगा, क्योंकि लंबे समय तक काम करते-करते हम वहां रच-बस गये थे। विश्व हिंदू परिषद में एक परिवार की तरह काम कर रहे थे। हम सोच रहे थे कि नये व्यक्ति के साथ काम करने में कैसा रहेगा। वह कहां-कहां हमें लगायेंगे। यानी एक प्रकार से मन में बड़ा हतोत्साह रहा। लेकिन फिर लगा कि चलो काम करना है, तो चले गये। उसके बाद फिर हमें वनांचल प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया। मुझे लगता है कि भाजपा पहले ही यह तय कर चुकी थी कि यह अलग राज्य कभी न कभी बनेगा, इसीलिए वह इस क्षेत्र का नाम वनांचल प्रदेश तय कर चुकी थी। भाजपा ने अपनी कार्यसमिति की बैठक में भी यह मान लिया था कि झारखंड अलग प्रदेश बनना चाहिए, इसीलिए उसने अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि जीतने पर हम अलग राज्य बनायेंगे। बैठक में गोविंदाचार्य जी से हम सभी ने कहा कि आप जो समिति बना रहे हैं और हमको जब अध्यक्ष बनाये हैं तो वर्किंग इंडिपेंडेंसी होनी चाहिए। चुनाव में पार्टी किसको चुनाव लड़ायेगी, यह तो बिहार प्रदेश कमेटी तय करेगी, पटना में कोई रैली होगी, तो हम लोग इधर से भी जायेंगे, लेकिन वनांचल क्षेत्र में पार्टी को जो कार्य करना है, आंदोलन का कार्यक्रम होगा, उसमें काम की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यह बिहार प्रदेश ने मान लिया। उस समय हम और दीपक प्रकाश जी सारे लोग थे, हम सभी एक्टिव हुए, काम करना शुरू किया। उसमें गोविंदाचार्य, अश्विनी कुमार और कैलाशपति मिश्र जी का पूरा सहयोग मिल रहा था। ये लोग हमारा उत्साहवर्द्धन करते थे।

एक रोचक किस्सा आपको बताता हूं। जब मुझे वनांचल प्रदेश का अध्यक्ष बना दिया गया, तो काफी दौरा होने लगा। हमें घूमने-फिरने में बहुत दिक्कतें होती थीं। यह 1996 के आसपास की बात है। एक दिन हमने अश्विनी जी से कहा कि हम लोगों को घूमने में थोड़ी दिक्कत होती है। बस से घूमते थे। बहुत समय लग जाता है। हमारे पास कोई निजी वाहन नहीं था। उस समय तक हम थोड़ा-थोड़ा नेता बन गये थे। चुनाव लड़ने से थोड़ी-थोड़ी पहचान हो गयी थी, तो घूमने फिरने के लिए हमें लगा कि एक गाड़ी होनी चाहिए। हमने अश्विनी जी से इसलिए कहा, क्योंकि अश्विनी जी ही पैसे का थोड़ा-बहुत इंतजाम करते थे। साहस जुटा कर हमने उनसे कहा कि हम एक गाड़ी खरीदना चाहते हैं, आप थोड़ा सहयोग कर दें। हमें याद है कि उन्होंने बहुत अच्छी बात बतायी कि देखो गाड़ी तो हम खरीद देंगे, कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन पहले यह बताओ कि कैसे तुम उसे चलाओगे। उसमें एक ड्राइवर होगा, उसकी तनख्वाह होगी। तेल लगेगा, फिर उसका मेंटेनेंस है। यानी उस समय के हिसाब से पंद्रह-बीस हजार रुपये का मासिक खर्च है। यह कैसे करोगे, पहले हमें बताओ। हमने कहा कि हम जहां जायेंगे, वहां तेल मांग लेंगे। इसके बाद उन्होंने हमको समझाया कि देखो ऐसा नहीं होता है। कहीं जाओगे, तेल मांगोगे तो आपसे लोग दूर भागने लगेंगे। तब फिर हमसे बोले कि तुम एक काम करो, पूरा झारखंड से पचास एक लोगों की एक लिस्ट बनाओ, जो तुमको साल में दस हजार, बीस हजार सहयोग कर सकें, ऐसी लिस्ट बना कर हमें दो। तब हम सबझेंगे कि तुम्हारी गाड़ी चल सकती है, तुम चला सकते हो। उसके बाद हमने लिस्ट बनायी। चूंकि हमने विश्व हिंदू परिषद में काम किया था, उस समय भी कुछ न कुछ लोगों से सहयोग हम लोग लेते ही थे, ऐसे ही चालीस-पचास लोगों की लिस्ट बनाने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। उसके बाद उन्होंने एक मारुति ओमिनी हमें खरीद कर दी। यह गाड़ी हालांकि वनांचल कार्यालय के नाम से थी, लेकिन मेरे जीवन की पहली गाड़ी थी। उसका 6516 नंबर था। वह बहुत दिन तक कार्यालय में रही। उससे हमें बहुत लगाव हो गया था। इसलिए आज भी आप देखेंगे कि हमारी कुछ एक पुरानी गाड़ी का नंबर 6516 है।

वनांचल कार्यालय के नाम से जो पहली गाड़ी हमें दी गयी थी, उससे हमें बहुत सीख मिली कि संगठन को चलाने में क्या-क्या कठिनाई आ सकती है। उसका समाधान कैसे निकाला जा सकता है। अश्विनी जी ने उस समय कहा था कि तुम समझो कि ये पचास लोग ऐसे हैं, जो साल में तुम्हें एक बार सहयोग कर सकते हैं। तो इससे एक सीख मिली कि कैसे इस तरह से एक संगठन को खड़ा किया जा सकता है। कैसे उसे बेहतर तरीके से लोगों की मदद से चलाया जा सकता है। अश्विनी जी से यह सीख मिली कि कैसे पैसे का प्रबंधन किया जा सकता है। कैलाशपति जी से यह सीख मिली कि संगठन को कैसे धारदार बनाया जा सकता है। वहीं गोविंदाचार्य जी से हमें काम करने की काफी स्वतंत्रता मिलने के कारण काफी आत्मविश्वास मिला। उससे हमारा मानसिक मनोबल बढ़ा। उन लोगों के साथ काम करने में काफी आनंद आता था। कोई भी निर्णय लेने के पहले एक बार हम लोग उन्हें दिखा देते थे कि हम लोग क्या निर्णय ले रहे हैं, तो वे कहते थे कि ठीक है।

सवाल : 1998 में जब आपके नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव लड़ा गया, तो उस समय 14 में से 12 सीटें भाजपा के खाते में आयी थीं। तो क्या यही रीजन था कि आपको झारखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया?
जवाब : देखिये रीजन क्या था, यह तो मैं नहीं जानता हूं, लेकिन मैं आपको उससे पहले की एक घटना बताता हूं। जब हम 1990 में भारतीय जनता पार्टी में आये थे, तो उस समय एक तो लोगों में बीजेपी की इतनी अधिक स्वीकार्यता नहीं थी। उसके कई एक कारण थे। उस समय पार्टी राज्य में धीरे-धीरे राइज ही कर रही थी। और सबसे बड़ा कारण था कि उस समय के जो भी नेता थे, वे अपनी पसंद के लोगोें को चुनाव लड़ाते थे। देखिये, जब हम 1990 में भाजपा में आये, तो उस समय विधानसभा का चुनाव हो रहा था। तो मेरी इंट्री समझिये उसी समय भाजपा में हुई। उस समय समरेश सिंह, दीनानाथ मिश्र और इंदरसिंह नामधारी वगैरह पार्टी में बगावत कर अलग हो गये। उस समय सह संगठन मंत्री के रूप में संथाल परगना की जिम्मेदारी हमारे जिम्मे थी। हम अधिकांश समय उधर ही रहते थे। राठौर जी उधर से आते थे। हमने देखा क्या कि चकाई क्षेत्र से एक व्यक्ति को लाकर बरहेट से चुनाव लड़ाया जा रहा है। उस समय बांका में एक एसडीओ थे, हालांकि वह दुमका के रहनेवाले थे। चूंकि बांका में वह भाजपा नेता को मदद पहुंचा रहे होंगे, इसलिए उनकी पत्नी को शिकारीपाड़ा से लड़ाया जा रहा था। उसी तरह बोकारो तरफ की यूनियन में एक महिला काम करती थी, तो उनको लिट्टीपाड़ा से चुनाव लड़ाया जा रहा था। यानी कहने का मतलब कि इसी प्रकार से उस समय के नेताओं की पसंद नापसंद के आधार पर चुनाव में टिकट दिया जा रहा था। उस समय तो हम कुछ कर भी नहीं सकते थे, क्योंकि हम पहली दफा आये थे पार्टी में। हमने महसूस किया कि ये लोग गलत कर रहे हैं। हमने साहस जुटा कर गोविंदाचार्य जी से कहा कि ऐसे चुनाव थोड़े होता है। उनका कहना था कि यह बिहार प्रदेश भाजपा का निर्णय है, हम लोग क्या कर सकते हैं। चलो आगे देखेंगे। फिर 1995 में जब विधानसभा का चुनाव आया, तो उस समय हमने काफी कुछ परिवर्तन किया। हमने कहा कि भाई ऐसे नहीं चलेगा। जो चुनाव लड़ सकता है, जो रेस कर सकता है, ठीक है हम जीतेंगे नहीं, लेकिन भविष्य में जो हमारे लिए एसेट्स हो जाये, उसे चुनाव में उतारेंगे। क्योंकि बाहर से लाकर अगर हम किसी को लड़ा देंगे, तो जीतेगा तब तो ठीक है, लेकिन अगर हार गया, तब तो वह वापस चला जायेगा। तो पांच साल तक वर्कर के पास कोई नहीं रहेगा। हमने तय किया कि हम हर हाल में स्थानीय लोगों को चुनाव लड़ायेंगे। 1995 में हमने संथाल परगना में ऐसे ही लोगों को चुनाव में उतारा। एक तरह से पूरे झारखंड में भी हम लोगों ने ऐसा ही किया। इसका फायदा यह हुआ कि भाजपा उम्मीदवार ने चुनाव में प्रतिद्वंद्वी को सीधी टक्कर दी। अगर वह चुनाव हारा भी तो बहुत कम वोट से। पहली बार 1995 में बढ़िया से संघर्ष हुआ। फिर तो 1998 में हम लोगों ने सरकार ही बना ली। उसके बाद लोकसभा के चुनाव में भी हम लोग देखते थे कि चुनाव कौन जीत सकता है। क्योंकि लोकसभा या विधानसभा में चुनाव तो जीतना है, क्योंकि वहां तो लोग मुंडी ही गिनता है न। वहां यह नहीं देखा जाता कि आप कितने त्यागी हैं, तपस्वी हैं। इसका कोई मतलब नहीं होता। वहां तो जीत मिलने वाले को ही जगह मिलती है। इसका एक दो उदाहरण देकर मैं आपको बताता हूं। जैसे शैलेंद्र महतो की पत्नी आभा महतो को हम लोगों ने चुनाव लड़ाया। उससे पहले जमशेदपुर में महाभारत सीरियल में जो कृष्ण की भूमिका में थे नीतीश भारद्वाज, उनको हम लोगों ने चुनाव लड़ाया था, क्योंकि जमशेदपुर में हम जिस किसी को भी चुनाव लड़ा रहे थे, वह जीत नहीं पा रहा था। वोट तो वह लाता था, लेकिन एक सीमा के बाद हमें हार मिलती थी।
1996 के चुनाव में सभी ने सोचा कि क्या किया जाये। तो उसी में यह तय हुआ कि अगर महाभारत के कृष्ण नीतीश भारद्वाज को चुनाव लड़ाया जाये, तो अच्छा रहेगा। हम लोगों ने उन्हें लड़ाया और वह जीत भी गये, लेकिन जीत कर वह क्षेत्र से गायब हो गये।

जब जमशेदपुर की जनता ने महाभारत सीरियल के कृष्ण नीतीश भारद्वाज को माथे पर बिठा कर पूजा की, चुनाव जीतने के बाद वह क्षेत्र में दिखाई नहीं दिये, तब उनका विरोध होना शुरू हो गया। फिर हम लोगों ने सोचा कि अब क्या करना चाहिए, क्योंकि चुनाव जीतना जरूरी है। उसी समय शैलेंद्र महतो वगैरह को पार्टी में लाया गया था, लेकिन वह लोकसभा में थोड़ा सा रिवर्स चले गये, तो पार्टी दुखी हो गयी। फिर लगा कि क्या होगा, नहीं होगा, बड़ा मुश्किल लग रहा था। अब सवाल यह था कि हम जमशेदपुर सीट जीतें कैसे। शैलेंद्र महतो के नाम पर लालकृष्ण आडवाणी जी बिल्कुल तैयार नहीं थे। कह रहे थे कि जो व्यक्ति ऐसा कर सकता है, उसे लड़ा नहीं सकते। फिर भुवनेश्वर में वर्किंग कमेटी की बैठक थी। उसमें हम थे। रविशंकर जी को हमने कहा कि अरे यार शैलेंद्र महतो को लेकर फिर से हम लोगों को आडवाणी जी से एक बार मिलना है। उन्होंने साफ कहा कि दूसरा आॅप्शन चुनो। फिर मन में आया कि उनकी पत्नी को लड़ाते हैं। फिर बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने आडवाणी जी को शैलेंद्र महतो की पत्नी के बारे में मनाया। उसके बाद आभा महतो चुनाव लड़ीं और जीती भी। उसके बाद आपको भी याद होगा कि जमशेदपुर में रणधीर वर्मा की पत्नी रीता वर्मा को चुनाव लड़ाया गया। यानी इस प्रकार का कई एक प्रयोग, जब गोविंद जी आये, तो हम लोगों ने स्वतंत्र रूप से किया। इससे पार्टी के पक्ष में माहौल भी बना।

इसी तरह गिरिडीह से हम लोगों ने रवींद्र पांडेय को भाजपा उम्Þमीदवार बनाया। उनके पिताजी कट्टर कांग्रेसी थे। रवींद्र पांडेय जीते भी। यानी गोविंदाचार्य जी के समय में हम लोगों ने पार्टी को मजबूत बनाने के लिए काफी प्रयोग किये। अच्छी बात यह रही कि ऊपर के नेता हम लोगों के निर्णय को मानते थे, प्रश्रय देते थे। लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में भी वही हुआ। 2000 आते-आते संथाल परगना में भी नये लोगों को लाया गया जैसे प्रदीप यादव, ताला मरांडी वगैरह को, जिन्होंने चुनाव भी जीता। हमें लगता है कि मुझे मुख्यमंत्री बनाते समय कहीं न कहीं अटल जी और आडवाणी जी के जेहन में यह बात रही होगी। मैं केंद्र में मंत्री था। जब अलग राज्य की घोषणा हुई, तो मुख्यमंत्री कौन बने, इस मुद्दे पर आडवाणी जी ने हमसे पूछा। हमने उनसे कहा कि विधायकों को बुला लीजिए। उनसे आप बात कर लीजिए। विधायक जिनको कहते हैं, उनको आप मुख्यमंत्री बना दीजिए। इसके बाद सभी विधायकों को दिल्ली बुलाया गया। एक-एक विधायक से दिल्ली में नेताओं ने बात की। उसके बाद अटल जी के यहां से खबर आयी कि आप रिजाइन कर दीजिए और चले जाइये झारखंड। तो मुख्यमंत्री बनाने का जो सबसे बड़ा कारण हम समझते हैं, विधायकों ने संभवतया हमारा ही नाम दिया होगा, तभी तो हमें बनाया गया। फिर हम रिजाइन करके चले आये।

सवाल: चुनाव में सफलता के पीछे कारण क्या था। जीत में आप अपनी भूूमिका को कहां पाते हैं?
जवाब: देखिये, हमने कभी भी किसी व्यक्ति के साथ कोई पक्षपात नहीं किया। भले ही मेरे साथ किसी का बहुत ही अच्छा संबंध हो, लेकिन हमें लगा कि वह चुनाव नहीं जीत सकता है, तो उसको हमने आगे नहीं बढ़ाया। इस बात को कार्यकर्ता और नेता भी अच्छी तरह से जानता है। एक उदाहरण मैं आपको देता हूं। शंकर चौधरी हैं रामगढ़ में। पार्टी के अंदर कुछ न कुछ पोलिटिक्स चलती रहती है, उसे देख कर उनको शायद लगता था कि हम उन्हें चुनाव नहीं लड़ायेंगे। लेकिन जब 1995 का चुनाव आया, तो हमने एक सर्वे कराया। उस समय तो कागजी सर्वे कम होता था। वर्करों से राय-मशविरा ज्यादा होता था। उसके आधार पर हमने कैलाशपति जी से और कार्यसमिति में भी यह कहा कि अगर रामगढ़ में चुनाव जीतना है, तो शंकर चौधरी को लड़ाना होगा। हमारे पास दूसरा कोई उपाय नहीं है। फिर पार्टी ने उन्हें लड़ाया। उसके बाद शंकर चौधरी बहुत दिनों तक बार-बार उल्लेख भी करते थे कि हमें तो विश्वास ही नहीं होता था कि हमको पार्टी चुनाव लड़ायेगी, क्योंकि इनर पोलिटिक्स में हम नेताओं की पसंद नहीं थे। फिर वह विधायक बने भी। कहने का अर्थ है कि हमने कभी भी कोई पार्सियलिटी नहीं की। हमने अपने समय में बराबर चुनाव जीतनेवाले को टिकट देने की वकालत की, भले ही उसका हमसे मतभेद ही क्यों न हो, वह हमें गाली ही क्यों न देता हो। इस मामले में हमने कंप्रोेमाइज नहीं किया। आज भी मैं नहीं करता। हां मैं जरूर यह कोशिश करता हूं कि लोग इस बात को समझें, लेकिन जो नहीं समझता है वह तकलीफ में थोड़ा रहता है। हमें लगता है कि हमारी कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता का यह बड़ा कारण रहा, जो आज भी बना हुआ है।

कहानी उस सीएम की, जिसे भ्रष्टाचार देख नींद नहीं आती थी

सवाल : ढाई साल तक आपने सरकार चलायी। उस दौरान आपने जो कार्य किया, उसमें क्या कमी रह गयी, क्या कार्य अधूरा रह गया, क्या वह कार्य अभी तक अधूरा है। आपका विजन था कि झारखंड को इस तरीके से मैं बनाऊंगा, वह कार्य अभी तक कुछ आगे बढ़ा भी है या नहीं?
जवाब : देखिये, जिस दिन हमने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उससे पूर्व तो हमने कुछ वैसा सोचा नहीं था। लेकिन जब शपथ ली तो मुझे बहुत चिंता होने लगी कि मुख्यमंत्री के नाते न जाने राज्य की जनता को हमसे क्या-क्या उम्मीदें होंगी। उसको हम पूरा कर पायेंगे या नहीं। यह सवाल बार-बार मन में कचोटता था। फिर लगा कि न जाने लोग मेरे बारे में क्या-क्या सोचते होंगे। मुझे क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। क्योंकि राज्य में सरकार चलाते हुए हमने किसी को करीब से देखा भी नहीं था। उस समय बिहार में बीजेपी की तो कोई सरकार बनी भी नहीं थी। थोड़े दिन के लिए 1977 में सरकार बनी भी थी, तो उस समय हम लोग बच्चे ही थे। उस वक्त कैलाशपति मिश्र वगैरह मंत्रिमंडल में थे। बहुत दिनों तक वह सरकार चली भी नहीं। मेरे मन में बार-बार यह चिंता होती थी कि हमसे जनता क्या उम्मीद कर बैठी होगी। कार्यकर्ताओं की उम्मीद हमसे क्या है। हम क्या करें, कहां से शुरू करें। यह बात दिमाग में आती थी। मन को कचोटता था कि क्या करें, क्या नहीं करें, कैसे करें। बहुत सोच-विचार के बाद लगा कि जो तकलीफ हमने झेली है, या जिसको मैंने करीब से अनुभव किया है, उसको दूर करना चाहिए। फिर मेरे मन में आया कि सबसे पहले रूरल कनेक्टिविटी पर ध्यान देना चाहिए। क्षेत्र में पुल-पुलिया के निर्माण पर फोकस करना चाहिए। फिर हमने सोचा कि आखिर झारखंड से लोग बाहर क्यों जाते हैं। ध्यान आया कि उसमें रोजगार, पढ़ाई और स्वास्थ्य बड़ा कारण है। मेरे मन में आया कि बुनियादी सुविधाओं में अभाव के कारण ही झारखंड से लोग बाहर जा रहे हैं। अगर उन सुविधाओं को झारखंड में ही उपलब्ध करा दिया जाये, तो लोग बाहर नहीं जायेंगे। बुनियादी सुविधा का मतलब आवागमन की सुविधा हो, परिवहन व्यवस्था हो, सड़क हो, पुल पुलिया हो, फिर लंबी यात्रा के लिए ट्रेनें हो जायें तो कुछ हद तक बुनियादी सुविधाओं की भरपाई हो जायेगी।

जब केंद्र में अटल जी की सरकार थी और उस मंत्रिमंडल में हम वन पर्यावरण राज्यमंत्री थे, उस समय कई रेलवे लाइन पारित हुई थी। उसमें हजारीबाग-रांची वाली रेलवे लाइन, हजारीबाग कोडरमा रेलवे लाइन, कोडरमा से गिरिडीह, फिर देवघर, दुमका, रामपुर हाट रेल लाइन आदि। यह सब रेलवे लाइन राज्य बनने के पहले ही पारित हुई थीं। लेकिन काम शुरू नहीं हुआ था। उसमें लोहरदगा वाली रेलवे लाइन का चौड़ीकरण करना था। हम जब मुख्यमंत्री बने तो हमें लगा कि इन सारी योजनाओं को पूरा करना चाहिए। उस समय रेल मंत्री नीतीश कुमार थे। उनसे मैंने बात की। उन्होंने मुझसे कहा कि देखो रेलवे के पास जितना संसाधन है, उसको हम लोग राज्यों को अनुपात में बांटते हैं। उन्होंने बताया कि किस आधार पर किस राज्य को कितना दिया जाता है। फिर हमने नीतीश जी को कहा कि इससे तो झारखंड का काम हो ही नहीं सकता इस जमाने में। हमको यह बताइये कि काम कैसे होगा। हमको रेलवे लाइन चाहिए। दुमका रेलवे लाइन से नहीं जुड़ा है, वह जुड़ना चाहिए। गिरिडीह मेरा घर था। गिरिडीह-कोडरमा रेलवे लाइन बननी चाहिए। रांची आज राजधानी है। हजारीबाग-रांची रेल लाइन से जुड़ना चाहिए। तो बोले कि एक ही काम हो सकता है कि अगर झारखंड सरकार योजनाओं में अपना हिस्सा देगी, तो काम हो सकता है। पूंजी के रूप में दो तिहाई हिस्सा राज्य सरकार को देना होगा। इस परिस्थिति में पांच साल में काम पूरा हो सकता है। तय हुआ कि दो तिहाई झारखंड सरकार देगी, एक तिहाई केंद्र सरकार देगी। इसके बाद हमने हामी भर दी। फिर हमें बताया गया कि जहां-जहां रेलवे लाइन पर ओवर ब्रिज बनना है, उसमें पचास प्रतिशत राज्य सरकार को देना होता है और पचास प्रतिशत केंद्र सरकार को। इस पर भी हमने हामी भर दी। मैंने कहा कि हमारे यहां जितना भी जरूरी ओवर ब्रिज है, सब बनवा दीजिए, जितना पैसा लगेगा हम देंगे। क्योंकि हम चाहते थे कि कनेक्टिविटी के मामले में झारखंड में कहीं कोई दिक्कत नहीं हो। रोड जाम नहीं हो। उसके बाद रेलवे और झारखंड सरकार के बीच एग्रीमेंट हो गया, फिर एमओयू साइन हो गया। हमने चेक भी दे दिया और काम भी शुरू हुआ। बातचीत के क्रम में बाबूलाल ने स्वीकार किया कि उनके मुख्यमंत्रित्व काल में भी भ्रष्टाचार था, कहा कि भ्रष्टाचार की बात सोच कर हमें रात में नींद नहीं आती थी।
हम यह कह रहे थे कि रोड हम इसलिए बना रहे थे कि आवागमन में सुविधा हो। जैसे दूसरे राज्यों में बड़े-बड़े टाउन में रिंग बस सर्विस उपलब्ध है, तो हमारी कल्पना यह थी कि हम झारखंड के गांव में भी रिंग बस सर्विस को शुरू करायें। इसके पीछे मेरी कल्पना यह थी कि पढ़ाई-लिखाई के लिए लोगों को बाहर से आकर रांची में नहीं रहना पड़े, बल्कि आवागमन ऐसा हो जाये कि दूसरे जिलों से भी बच्चे रोज रांची आ जायें और पढ़ाई या नौकरी करने के बाद अपने घर लौट जायें। मेरी कल्पना थी कि इस चेन में हम पूरा राज्य को कवर कर दें। मेरी कल्पना यह थी कि झारखंड की सिर्फ राजधानी स्मार्ट नहीं हो, शहर सिर्फ स्मार्ट नहीं हों, बल्कि गांव भी स्मार्ट हों। मेरी सोच यही थी कि लोगों को आने-जाने में बिल्कुल ही परेशानी न हो। गाड़ियों के लिए उन्हें ज्यादा देर तक इंतजार नहीं करना पड़े। यानी हर दिन कम से कम 18 से बीस घंटे तक गाड़ियां लोकल स्तर या जिला कनेक्टिविटी के तहत चलती रहें। ऐसा करने से आवागमन में तो सहूलियत होती ही, सड़कों की सुरक्षा भी बढ़ जाती। इसमें कोई शक नहीं है कि सड़कें काफी बनीं। लेकिन हमारी जो कल्पना थी कि मुंबई, कोलकाता जैसी आवागमन की सुविधा झारखंड में हो, वह अभी तक अधूरी है।
झारखंड के गांव को भी स्मार्ट बनाने की दिशा में मेरी सोच थी कि अगर गांव में ही पूरी तरह से बिजली उपलब्ध हो जाये, तो बहुत सारे काम गांव में ही होने लगेंगे, उसके लिए लोगों को शहर नहीं आना पड़ेगा। इससे रोजगार भी निर्मित हो जायेगा और शहर पर से लोड भी कम हो जायेगा। उस समय इसके तहत हमने एक साथ 52-54 विद्युत सब स्टेशन का काम शुरू करवाया था बिजली विभाग में। हमने एक दिन बिजली बोर्ड के चेयरमैन राजीव रंजन को झारखंड के नक्शे के साथ बुलाया और कहा कि हमको यह चाहिए। हमने कहा कि आप झारखंड में ऐसा ग्रिड बनाइये, ताकि सब जगह 24 घंटे बिजली रहे। अगर यहां कोई तार गिर जाये और बिजली कट जाये, तो दूसरी तरफ से बिजली लोगों के पास पहुंच जाये। उन्होंने कहा कि सर ऐसा हो सकता है। इसके बाद हमने उनसे कहा कि आप इसकी प्लानिंग कीजिए कि कितना विद्युत सब स्टेशन चाहिए। कितना ग्रिड चाहिए। उसका बजट बनाने को हमने कहा। हमने कहा कि पहले हमें गांव में बिजली नहीं देखनी है, पहले हमें यहां नक्शा में दिखाइये कि कैसे वहां बिजली जायेगी। हमने उनसे कहा कि झारखंड का कोई भी गांव अंधेरे में न रहे। ऐसा नहीं हो कि एक जगह बिजली का तार टूट जाने पर पूरा का पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाये। अगर ऐसा होता है तो वैकल्पिक मार्ग से वहां तक बिजली पहुंचे, यह व्यवस्था करनी चाहिए। लेकिन मेरी यह परिकल्पना पूरी नहीं हुई। हालांकि बिजली के मामले में अभी बहुत कुछ काम हो गया है। फिर भी अभी काफी कुछ करना है।

सवाल : उस ढाई साल के दौरान आपने कौन सा काम किया, जिससे आपको संतुष्टि मिली कि मुख्यमंत्री रहते हमने यह काम किया?
जवाब : देखिये, अपने मुख्यमंत्रित्व काल में हमने रोड में बहुत अच्छा काम किया। हमने महसूस किया था कि गांव में सड़कें नहीं होने से, उन पर पुल-पुलिया नहीं होने से ग्रामीणों को क्या कुछ परेशानी होती है, इसलिए उस काम को सबसे पहले हमने किया। हमें लगता है कि उस कारण से भी लोग हमें याद करते हैं। दूसरा जो कारण था, राज्य में माओवादियों का बड़ा आतंक था। माओवाद हमें विरासत में मिली थी। माआवादियों ने जगह-जगह लैंड माइंस बिछा रखी थी। जब-तब वे विस्फोट भी करते थे। विस्फोट में पुलिस के काफी जवान मारे गये। आये दिन पब्लिक के साथ भी घटनाएं होती थीं। चतरा, पलामू, गिरिडीह, पीरटांड़ वगैरह में माओवादियों का काफी आतंक था। वहां के बड़े-बड़े किसान गांव छोड़ चुके थे। जो रह गये थे, वे खेती बाड़ी छोड़ चुके थे। किसानों में माओवादियों की काफी दहशत थी। हमें यह पता था कि अच्छी शासन व्यवस्था की पहला ड्यूटी होती है कि वहां का लॉ एंड आॅर्डर ठीक हो। लोग भयमुक्त होकर जी सकें। मैंने ठाना था कि राज्य में ऐसी शासन व्यवस्था होनी चाहिए, जहां आराम से लोग भयमुक्त होकर रह सकें, खेती-बाड़ी कर सकें। लॉ एंड आॅर्डर के मोर्चे पर हमने काफी काम किया। इसके लिए हमने कई कठोर कदम भी उठाये। उसकी कीमत भी हमें चुकानी पड़ी। उसके बाद लोगों में काफी कांफिडेंस आया। आज भी मैं मानता हूं कि चतरा, पलामू के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी हमें लोग याद करते हैं। हम जाते हैं तो लोग स्वागत करते हैं। उसका एक कारण यह भी है कि जो लोग नक्सलियों के भय से खेत-खलिहान छोड़ चुके थे, गांव से पलायन कर गये थे, वे अपने गांव को लौट आये थे। हमें लगता है कि यह हमने अच्छा काम किया, लोगों की इस तकलीफ को हमने दूर किया।

सवाल: आपने कहा कि हमें नक्सलियों पर नकेल कसने की कीमत भी चुकानी पड़ी। तो क्या वह 2007 की घटना के रूप में सामने आयी?
जवाब: हां, उसमें सिर्फ हमारे बेटे की ही हत्या नहीं हुई। 19 ग्रामीणों की भी हत्या नक्सलियों ने कर दी थी।
(इस सवाल का जवाब देते वक्त बाबूलाल के आंसू आंखों की परत के पीछे आ खड़े थे, आवाज भर्रा रही थी और कुछ देर के लिए वे थम से गये थे)

सवाल : क्या घटना में आपके बेटे को ही टारगेट किया गया था?
जवाब : नहीं। टारगेट किया था हमारे भाई नुनू मरांडी को। चूंकि लड़का साथ में गया था, सो उसके साथ यह हादसा हो गया। मेरा भाई किसी तरह उस घटना में बच निकला था। नक्सलियों ने उनको टारगेट करके गोली चलायी थी, लेकिन उन्हें लगी नहीं। हमने इसीलिए आपको कहा कि नक्सलियों पर नकेल कसने की कीमत हमें चुकानी पड़ी, क्योंकि उस घटना में मेरे परिवार को टारगेट किया गया था। वैसे इस तरह की घटना तो नक्सली करते ही रहते थे।
सवाल : झारखंड के लिए आपने इतना बड़ा बलिदान दिया है। इस बारे में हमें जरा विस्तार से बताइये। क्या जिस समय आप नक्सलियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर रहे थे, तो आपको लग नहीं रहा था कि वे इसका बदला लेंगे?
जवाब : देखिये, नहीं लग रहा था, ऐसा कुछ नहीं है। इतना तो हम जानते थे कि नक्सली रीएक्ट करेंगे, लेकिन मेरे पास दूसरा रास्ता भी तो नहीं था। मुख्यमंत्री होने के नाते हमें हर हाल में झारखंड में भयमुक्त शासन देना था। ऐसा माहौल बनाना था, जहां लोग खुली हवा में सांस ले सकें। भयमुक्त होकर आ-जा सकें। रोजी-रोजगार कर सकें। खेती-बाड़ी कर सकें। देखिये, हम नक्सलियों के खिलाफ नहीं थे। हम उनको भी समझाने की कोशिश कर रहे थे। हम उनसे आग्रह भी कर रहे थे वे देश की मुख्यधारा में लौट आयें।
आइये हम आप मिल कर राज्य को आगे बढ़ायें। लेकिन मेरे इस आग्रह का उन पर असर नहीं हो रहा था, तो फिर मेरे पास कठोर कार्रवाई के अलावा क्या रास्ता था। देखिये, हम आज भी बार-बार लोगों को कहते हैं कि विकास का मतलब सिर्फ चावल बांटना नहीं होता है। धोती-साड़ी बांटना नहीं होता है। विकास का मतलब भैंस-बकरी बांटना नहीं होता है। ये तो ठीक है। विकास के लिए यह जरूरी है, ताकि उनको एक सहारा मिल जाये। जैसे कोई आदमी बीमार होता है। उनको हम कोई टैबलेट देते हैं। टैबलेट तो सिर्फ उस बीमारी को दूर करने के लिए है। लेकिन आदमी को स्वस्थ रहने के लिए उसको पौष्टिक आहार तो मिलना ही चाहिए न। अगर वह भूखा है, तो टैबलेट खाकर वह जिंदा तो नहीं रह सकता न। तो हमने कहा कि विकास के लिए जो जरूरी चीजें हैं यानी पहली जरूरत है परिवहन की व्यवस्था ठीकठाक हो, तो उसके लिए सड़कें ठीक होनी चाहिए। नदी-नाले पर पुल-पुलिया की व्यवस्था होनी चाहिए। ट्रेनें होनी चाहिए। हवाई जहाज सुविधा भी होनी चाहिए। अगर आवागमन की सुविधा होगी, तभी तो गांव विकास कर पायेगा। यानी गांव की उत्पादित वस्तु ट्रेन से लंबी दूरी तक पहुंच पायेंगी। प्लेन से उन वस्तुओं को और दूर तक ले जाया जा सकता है। लंबी दूरी की बसें रहने से किसान अपने उत्पादित माल को आसानी से दूसरी जगह भेज सकते हैं। बेचनेवाला सड़क मार्ग से अपना सामान बाजार तक पहुंचा सकता है, जहां खरीदनेवाला ले सकता है। विकास के लिए सड़कें हर हाल में जरूरी हैं। माओवादी सड़कों को बनने नहीं देना चाहते थे। वह विकास नहीं होने देना चाहते थे। एक ओर वे भाषण भी देते थे कि आजादी के इतने वर्षों के बाद विकास की किरण गांवों तक नहीं पहुंची। दूसरी तरफ जब सड़क बनने लगती थी तो माओवादी कहते थे कि इस सड़क पर तो गाड़ी पैसे वालों की आयेगी। वे आयेंगे और लूट कर चले जायेंगे। ऐसा कह कर वे गांववालों को उकसाते थे। बेचारे गांववाले जानते नहीं थे कि विकास क्या होता है, इसलिए कभी-कभी वे इन नक्सलियों की बातों में आ जाते थे और सड़क निर्माण का विरोध भी करने लगते थे। मतलब नक्सलियों का एक ही मकसद था लोगों को दिग्भ्रमित करना। हम बार-बार गांव में जाकर कहते थे कि भाई गांव का विकास तभी होगा, जब गांववालों को आप परिवहन की सुविधा उपलब्ध करायेंगे। इनको बिजली उपलब्ध करायेंगे। जैसे कुछ लोग कहते थे कि तालाब बना दीजिए, उससे सिंचाई होगी। उस पर हम कहते थे कि पहले तालाब बनाइयेगा और अगर आपके पास सड़कें नहीं हैं, तो फिर क्या होगा। मान लीजिए आपने उत्पादन कर भी लिया तो उस उत्पादन को आप बाजार तक कैसे पहुंचायेंगे। या बाजार वाले भी खरीदने के लिए आप तक कैसे पहुंचेंगे। इसके लिए आपको सड़क तो बनानी ही पड़ेगी। नक्सलियों को लगता था कि अगर सड़क बन गयी, तो पुलिस आ जायेगी, हमें पकड़ेगी, इसलिए अपने बचाव के लिए नक्सली सड़क नहीं बनने देते थे। इसके बाद तो एक ही रास्ता बचता था न कि पुलिस कठोर कदम उठाये। नक्सली यह कह कर गांववालों को उकसाते थे कि यहां डॉक्टर नहीं रहते। हमारा कहना है कि गांव में डॉक्टर तभी जायेगा, जब वहां की सड़कें जाने लायक हों, बिजली हो, यानी बुनियादी सुविधाएं हों। अब जो डॉक्टर एमबीबीएस करता है रांची में, पटना में, दिल्ली में, मुंबई में, पढ़-लिख कर वह भी तो चाहता है कि उसके बाल-बच्चे पढ़ाई-लिखाई करें ठीक से। वह नयी-नयी शादी करे और उसको आप कह देंगे कि आप लोहरदगा के जंगली इलाके में ड्यूटी करें, जहां आने-जाने की सुविधा नहीं है तो डॉक्टर वहां कैसे जायेगा। अगर आप किसी मास्टर को दुरूह जगहों पर भेजेंगे, तो वह नहीं रहेगा। क्योंकि वह भी तो अपने बाल-बच्चों को पढ़ाना चाहेगा। इसके लिए आपको बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करानी पड़ेंगी और इस रास्ते में नक्सली बाधक बनते थे। और जब बाधक बनते थे, तो स्वाभाविक है कि पुलिस कठोर कदम उठायेगी। जो सरकार में हैं, उन्हें तो काम करना ही पड़ेगा। दूसरा उपाय क्या है। दिनकर जी ने लिखा था: अपनों को भी दंड देना धर्म होता है। जब अपने लोग भी विकास में बाधक बन जायें तो उपाय क्या है। हम जब गांव में मास्टर थे। उस समय गांव के स्कूल में कोई मास्टर आता ही नहीं था। वे लोग यही कहते थे कि आने-जाने का कोई रास्ता नहीं है। रहने की कोई जगह नहीं है। यह सच भी था। लेकिन आज तो रोड के मामले में वह स्थिति नहीं है। अब तो कहीं भी बाजार में रहता है, मोटरसाइकिल से चला गया। बच्चों को पढ़ा कर शाम में वहां से चल कर घर पहुंच जाता है।

सवाल : उस घटना के बाद तो एक तरह से आप टूट ही गये होंगे। इसके बाद आप उससे उबरे कैसे?
जवाब : आजादी के इतिहास को अगर आप पढ़ियेगा, तो आप देखेंगे कि स्वतंत्रता की लड़ाई लड़नेवाले एक-एक व्यक्ति ने क्या कष्ट झेला है। उस तुलना में तो हम लोगों को कुछ भी कष्ट नहीं हुआ। उनकी तुलना में हमने क्या बलिदान दिया है। ठीक है मेरे बच्चे की हत्या हो गयी। और भी कई लोगों की हत्या हो गयी। स्वतंत्रता आंदोलन का एक-एक इतिहास देखें, वीर सावरकर हैं, भगत सिंह वगैरह को ही देखिये, उनकी तुलना में हम लोगों ने क्या कुर्बानी दी। वे लोग भी अपनी लाइफ को अच्छे से जी सकते थे, क्योंकि उस जामने में लोग अच्छे से पढ़े-लिखे थे। उनको देख कर हमें बल मिलता है।

कहानी झारखंड की एक ऐसी संपदा की, जिसका दोहन होता रहा, लेकिन चमक आज भी बरकरार है

सवाल : राजनीति की राह में जगह-जगह पर आपको धोखा मिला। आपने 2006 में जेवीएम भी बनायी। आपने विधायकों को तैयार किया, लेकिन फिर उन्होंने रास्ता बदल लिया, इस पर क्या कहना है?
जवाब : यह सब होता रहता है राजनीति में। अगर आप बहुत ताकतवर रहेंगे, तो लोग आपके खिलाफ नहीं जायेंगे। बहुत ताकत का मतलब सिर्फ शरीर की ताकत ही नहीं होती, पैसे की भी ताकत होती है। हमारे पास अगर विधायकों की संख्या अधिक होती, तो लोग हमारे ही पास चले आते, हम ही सरकार बना लेते। लेकिन उतने विधायक हमारे नहीं जीत पाये, तो यह उलटा हो गया। यह तो राजनीति में होता रहता है।

सवाल : लेकिन आपको आभास तो होता ही होगा?
जवाब : होने के बाद भी आप कर कुछ नहीं सकते न। आदमी को तो आप बांध नहीं सकते हैं न। अगर कोई आपको बता रहा है कि जो व्यक्ति आपसे मिलने आया था, वह आपके विरोधी से मिल रहा है, तो हम क्या कर सकते हैं। हम तो उनसे इतना ही बोल सकते हैं कि अरे आपके बारे में हम ऐसा सुन रहे हैं। आप तो यही कहेंगे कि ऐसा नहीं है। ऐसे ही हम चले गये थे। काम था। इस पर आप क्या कर सकते। आदमी को तो आप बांध नहीं सकते। ऐसा नहीं है कि जानकारी नहीं होती है, पता नहीं चलता है। पता सब चलता है, लेकिन जान कर भी आप क्या कर सकते हैं। मनुष्य तो मनुष्य है न। अगर उसने ठान लिया कि उसको जाना है, तो वह तो जायेगा ही न।

सवाल : ऐसा होने पर आपको कष्ट नहीं होता?
जवाब : कष्ट हो होता ही है। चूंकि हम मनुष्य हैं, तो होगा ही। हम लोग जानते हैं न कि आदमी को एक दिन मरना है।

सवाल : आखिर आपको गुस्सा क्यों नहीं आता?
जवाब : नहीं, मेरे में थोड़े समय के लिए गुस्सा होता है। बहुत अधिक समय के लिए नहीं होता है। फिर आदमी सोचता है कि चलो यह सब तो होना ही था। हम कमजोर थे, लोग भाग गये, हम मजबूत रहते, तो लोग मेरे पास भाग कर आता। राजनीति की यही रीत है। यह वर्षों से चलती आयी है। अगर आप प्राचीन डायनेस्टी भी देखेंगे, जो मजबूत रहा, उसके साथ लोग जुड़े। या किसी के साथ स्वार्थ रहा, तो उसके साथ लोग जुड़े और उसकी ओर से लड़े।

सवाल : लेकिन समय का चक्र घूम गया। आज वही लोग आपके अंडर में काम कर रहे हैं?
जवाब : नहीं, अंडर की कोई बात ही नहीं होती। हम तो साथ में काम करते हैं। हमने पहले भी कहा कि हम कोई भी काम इस प्रकार से नहीं करते हैं। अभी भी राजनीति में हैं तो हम लोगों से कहते हैं। अभी भी बहुत से लोग आते हैं, कहते हैं कि अब तो आप आ गये ठीक हो गया। हमारा थोड़ा ध्यान रखिये। तो हम कहते हैं कि देख यार इस सब गलतफहमी में मत रहना कि हम आपका ध्यान रखेंगे। आप काम करो। बीजेपी राष्टÑीय पार्टी है। बड़ी पार्टी है। तो यहां दिल्ली से भी नजर रहती है। पार्टी आलाकमान कई बार खुद सर्वे करवाता है। पता करता है कि कौन चुनाव जीत सकता है। हम भी चाहेंगे कि चुनाव जीतने वाले को ही उतारा जाये, तो टिकट तो उसी को मिलेगा, जो चुनाव जीत सकता है। इसलिए आप हमारे मित्र हैं तो यह मत सोचो कि हम आपके लिए कुछ कर देंगे। हां अगर लगेगा कि आप ही जीत सकते हो, तो जरूर लड़ायेंगे, आपके साथ अन्याय नहीं होगा। लेकिन यह कहोगे कि आपके साथ मेरा बहुत अच्छा संबंध है, आपके साथ इतने वर्षों से जुड़े हुए हैं, तो इसलिए आपको हमारे लिए कुछ करना है तो यह तो नहीं हो सकता है। हम कहते हैं कि आप काम करो, क्षेत्र में जाओ, लोगों के बीच में रहो। पार्टी अगर सर्वे करायेगी, तो लोग आपका ही नाम लेंगे, इसलिए काम करो।

सवाल : खनिज संपदा से संपन्न है झारखंड। राज्य बने 21 साल हो गये। अभी भी झारखंड को गरीब राज्य ही कहा जा रहा है। कहां चूक हो रही है?
जवाब : देखिये, हमें लगता है कि दो-तीन चीजें हैं। खनिज तो हमारे पास है ही। डवलपमेंट के लिए आपको समझना पड़ेगा। विकास के सूत्र को आपको समझना पड़ेगा। परिवहन की सुविधा, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और उसके बाद हमारे पास जो रिसोर्स है उसको हम फिनिश्ड गुड प्र्रोडक्ट तक कैसे पहुंचा सकते हैं। बुनियादी सुविधाएं अगर हमारे पास रहेंगी, तो उसके बाद हम इस पर विचार कर सकते हैं। लेकिन हमारी समझ से दुर्भाग्य क्या है, हमें जो समझ में आता है। हम आपको कहीं दूर नहीं ले जायेंगे। जैसे रांची को ही आप लें। राज्य बने 21 साल हो गये। लेकिन अभी तक देखिये तो सीवरेज और डेÑनेज हम नहीं बना पाये। 21 साल हो गये, अभी भी हम रिंग रोड को कंप्लीट नहीं कर पाये। इसमें मैं किसी एक आदमी को दोष नहीं देता हूं। लेकिन हमें लगता है कि कहीं न कहीं हमारी जो प्लानिंग है, काम करने का जो तौर-तरीका है, टाइम मैनेजमेंट हम कर नहीं पाते हैं। इस पर हमको लगता है कि हम विकास पर विचार ही नहीं कर पाते हैं। हम कहते हैं कि अगर आपके पास परिवहन की सुविधा अच्छी है, हवाई सर्विस ठीक हैं, ट्रेनें ठीक हैं, सड़कें ठीक है, बिजली ठीक है, पानी ठीक है, स्वास्थ्य की सुविधा ठीक है, शिक्षा की सुविधा ठीक है, राज्य का लॉ एंड आॅर्डर ठीक है। तो लोग उद्योग लगाने के प्रति लालायित होंगे। राज्य में कोई भी पूंजी इन्वेस्ट करता है, तो इन सारी चीजों को देखता है कि ये सब ठीक हैं या नहीं। अगर ये सभी ठीक होंगी, तो कहीं भी कोई आकर पूंजी निवेश कर लेता है। चूंकि कभी भी वह रांची आ सकता है, कभी वह अपने यहां जा सकता है या यहां भी वह रह सकता है। एक उदाहरण हम आपको देते हैं। जब हम मुख्यमंत्री थे। चूंकि हमारा जुड़ाव संथाल परगना से अधिक रहा शुरू से। तो वहां हेल्थ सर्विस बहुत ही पुअर है। अब तो खैर मेडिकल कॉलेज एम्स वगैरह बन गया संथाल परगना में, लेकिन उस समय नहीं था। तो हमारे मन में था कि दुमका तरफ एक मेडिकल कॉलेज बने। लेकिन जो सरकारी रवैया था, वह ढीला ढाला था, तो हमने सोचा कि चलो किसी प्राइवेट अस्पताल को आमंत्रित करते हैं। इसके बाद काफी लोग मिलने आये। उसमें मणिपाल ग्रुप वाले भी आये थे। मैंने उनसे कहा कि आपको हम फ्री आॅफ कास्ट जमीन देते हैं, आप संथाल परगना में दुमका, देवघर इस बीच में कहीं भी अस्पताल बनाइये। तो उन्होंने कहा कि हम पैसा से जमीन चाहते हैं, आप हमको इधर ही दीजिए। हमने उनसे कहा कि आप संथाल में लगाइये हम आपको फ्री आॅफ कास्ट जमीन भी देंगे, उसमें जो उपकरण लगेगा, वह भी देंगे, आप वहां लगा लीजिए। उन्होंने कहा कि देखिये आप दुमका के बारे में चिंतित हैं, संथाल परगना के बारे में चिंतित हैं, तो सबसे पहले आप वहां प्राइमरी एजुकेशन को ठीक कीजिए। उसके लिए आप शिक्षा को पहले वहां दुरूस्त कीजिए। हमने कहा कि इससे इसका क्या संबंध है। स्कूल तो है ही वहां पर। इस पर उन लोगों ने हमको कहा कि अगर आप वहां अच्छे मेडिकल कॉलेज चाहते हैं, अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज चाहते हैं, तो फैकल्टी वहां तभी जायेगी, जब उनके बाल-बच्चों को पढ़ने के लिए वहां फेसिलिटी मिले। कोई भी डॉक्टर या कर्मचारी वहां जायेगा, तो वह चाहेगा कि उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और अच्छी शिक्षा तभी मिलेगी, जब अच्छे स्कूल हों। अगर बच्चे को पढ़ने के लिए वहां अच्छे स्कूल नहीं हैं, तो बच्चे वहां नहीं जायेंगे। पत्नी भी वहां नहीं जायेगी। पत्नी तो रहेगी बच्चे के साथ, ऐसे में डॉक्टर वहां कैसे काम कर पायेगा। इसके बाद मेरे दिमाग में कौंधा कि बात तो ठीक ही कह रहे हैं। इसीलिए हम बार-बार कह रहे हैं कि अगर बुनियादी चीजों को हम ठीक नहीं करेंगे, लॉ एंड आॅर्डर को ठीक नहीं करेंगे, तो कोई भी बाहर से यहां आना नहीं चाहेगा। अभी तो रोज ही रंगदारी मांगी जा रही है। जेल से मांगी जा रही है, यहां से मांगी जा रही है, वहां से मांगी जा रही है। रोज अखबारों में छप रहा है। तो पहले बुनियादी चीजों को आप ठीक करिये और उसके बाद आप लोगों को बुलाइये तो लोग आयेंगे। ये जो खनिज है, आपका कोयला है, वह इसे ले जाता है। आप यहां भी तो पावर प्लांट लगा सकते थे। बिजली यहां भी पैदा हो सकती थी। यहां और भी चीजों का छोटा-मोटा उद्योग लग सकता है। बहुत बड़े-बड़े उद्योग की जरूरत नहीं है। वही उद्योग चाहिए, जिसमें जमीन कम लगे। आज की तारीख में टाटा जैसी फैक्टरी खोलने में दिक्कत होगी। पहले हारिजेंटल घर बनते थे, फैक्ट्रियां बनती थीं, आज आप कम जमीन में वर्टिकल जा सकते हैं। आपको यह समझना पड़ेगा कि लोगों को कैसे रोजगार मिल सकता है। सिर्फ खनिज के भरोसे राज्य आगे बढ़ेगा, ऐसा नहीं है। खनिज से जो पैसा मिलता है, उसे हमें बाकी चीजों में इन्वेस्ट करना चाहिए। उन पैसों से हम कृषि को ठीक कर सकते हैं। कृषि पर आधारित उद्योग लगा सकते हैं।

सवाल : एक अपवाद छोड़ दें, तो झारखंड में जो सरकारें बनीं, वे स्थिर नहीं रहीं। क्या यह भी एक कारण है विकास नहीं होने का?
जवाब : हां वह तो रहा ही है। इसके बावजूद अगर बुनियादी सुविधाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जाता, तो स्थिति सुधर सकती थी।

सवाल : आप जीवन भर संघर्ष करते रहे। शुरू से लेकर अभी तक संघर्ष ही कर रहे हैं। युवा भी आपको एक आदर्श के रूप में देख रहे हैं कि जिस प्रकार से आप अभी तक उसी ऊर्जा के साथ संघर्ष कर रहे हैं, तो क्या आपको ऊर्जा विरासत में मिली है?
जवाब : देखिये, इसको हम संघर्ष नहीं कहते। दूसरे अर्थ में कहूंगा कि मेहनत करनी पड़ती है। चाहे संघर्ष कहिए या मेहनत कहिए, अर्थ में हो सकता है थोड़ा डिफरेंस होता होगा, लेकिन करीब-करीब भाव यही है। चूंकि मेहनत के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है न। अब संघर्ष आपको जीवन में करना ही पड़ेगा। स्वस्थ रहने के लिए भी आदमी को संघर्ष करना पड़ता है। स्वस्थ रहने के लिए सबेरे उठना जरूरी है। मैदान में दौड़ो, योग व्यायाम करो। यह सब तो करना पड़ता है। तो यह सब क्या है संघर्ष ही तो है। ऐसा थोड़े ही है कि आपके पास बहुत संपत्ति है और आप खाकर सोये रहो, तो पता चला कि आपका शरीर ही किसी काम का नहीं रहा। आपको अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। तो यह जीवन ही एक प्रकार से संघर्ष है। अगर किसी भी क्षेत्र में आप अपने को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो अच्छा रखना चाहते हैं, तो आपको मेहनत करनी पड़ेगी, संघर्ष करना पड़ेगा। आप अच्छा रहेंगे, तो लोग आपके साथ रहेंगे। बीमार होंगे तो कोई कितनी देर आपके पास बैठेगा। सामाजिक मजबूरी होती है, तो बीमार के पास आदमी चला जाता है कि मिलना पड़ेगा। मिलना भी चाहिए। मिलने से हौसला बढ़ता है। दोस्त यारों को देख कर मन को तसल्ली मिलती है। ढांढ़स बंधता है। लेकिन बैठने के बाद अंदर से फील करिये, तो कैसा लगता है। बीमार व्यक्ति से देर तक आप क्या बात करेंगे। आप तो यही न पूछेंगे कि क्या है, कैसे हैं। फिर आप सुझायेंगे कि ये खाओ-वे खाओ, उसके बाद मन करता है कि जल्दी वहां से नमस्कार करके चले जायें। यह सामान्य स्थिति होती है। अगर आप ठीक रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे, तो आपके पास बहुत सारे लोग आयेंगे मिलने के लिए। अपने आपको ठीक रखने के लिए तो आपको संघर्ष करना ही पड़ेगा।

सवाल: आपकी जिंदगी में इतना उतार-चढ़ाव आया, फिर भी आप मुसकुराते ही रहते हैं। कभी यह नहीं दिखता कि आपने क्रोध व्यक्त किया या कभी लाइन से हट कर किसी को कुछ बोल दिया?
जवाब: देखिय,े बहुत साफ है। सड़क पर अगर कोई व्यक्ति रोते मिलेगा, तो लोग किनारे होकर भाग जायेंगे। कोई वहां गाना गाता हो, गीत गाता हो, चाहे कैसा भी कपड़ा पहना हो, उसका चेहरा कैसा भी हो, यह कोई नहीं देखता। सब उसके गीत को सुनते हैं। अगर उसकी आवाज अच्छी है, तो जानेवाला व्यक्ति भी मोटरसाइकिल रोक देगा कि इतना अच्छा गानेवाला कौन है। तो कहने का मतलब है कि अगर आप मुसकुरायेंगे नहीं, हंसेंगे नहीं, हर समय आप गुस्से में रहेंगे, चिड़चिड़ापन में रहेंगे, तो आपके पास कितनी देर लोग बैठेंगे, कौन आपके पास जायेगा। जायेगा थोड़ी देर के लिए बैठेगा, मजबूरी होगी तभी जायेगा। जब पता चलेगा कि जाने के बाद तो बाबूलाल मरांडी ठीक से बात ही नहीं करता है, पूछने पर गुस्सा करके कुछ-कुछ बोल देता है, तो लोग जाना पसंद नहीं करेगा। आपको मजबूरी होगी मेरे पास आने की, तभी आयेंगे। लेकिन अगर आप सकारात्मक सोच वाले हैं, सबके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं, तो कोई भी उधर से जायेगा, जो आपको जानता है, तो आपसे मिलने की कोशिश करेगा। आप मिल लिये तो वह गप करता है। आप किसी के घर चले जाइये। अगर घर में लोग लड़ाई करता हो, ठीक से बात नहीं करता हो, तो आप बहुत देर वहां नहीं बैठेंगे। आप कहेंगे कि पिताजी ने आपके पास भेजा है। ये चिट्ठी है, ये कार्ड है आप ले लीजिए, हम चलते हैं। हंसी तो मनुष्य को भगवान ने गिफ्ट में दी है। हंसो, मुस्कुराओ, लोगों से बढ़िया से बात करो, तो लोग आपके पास आयेंगे, नहीं तो आयेेंगे ही नहीं।

सवाल: अगर पांच साल के लिए आपको झारखंड की जिम्मेदारी मिलती है, तो आज के झारखंड को आप कहां देखना चाहेंगे। किस दिशा में देखना चाहेंगे। अभी की परिस्थिति को देखते हुए झारखंड को लेकर आपका विजन क्या है?
जवाब: देखिये, एक बात तो मैं कहूंगा कि किसी की भी सरकार हो, बुनियादी काम तो करना ही करना चाहिए। सुविधाओं को ठीक करना चाहिए। उसको ठीक किये बगैर आप विकास की सोच नहीं सकते हो। मैं झारखंड में दो तीन चीजों को देखता हूं। स्वास्थ्य की सुविधा, सिंचाई की सुविधा को उपलब्ध कराना, बिजली तो करीब-करीब ठीक हो चली है, उसका प्रबंधन सुधारना है, ताकि लोगों को 24 घंटे मिल जाये। सड़कें भी बन गयी हैं, उन्हें थोड़ा ठीक ठाक कर लेना है। कुल मिला कर सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था, इन सबको ठीक करना है। शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को ठीक करना होगा। आप झारखंड में एजुकेशन का हब बना दीजिए। आज बहुत से बच्चे जो बाहर जा रहे हैं, वे नहीं जायेंगे। जिनके पास पैसे हैं, वे तो जायेंगे, लेकिन जो गरीब बच्चे हैं, बाहर नहीं जा पा रहे हैं, वे तो यहां पढ़ सकते हैं। उनको तो आप यहां शिक्षित कर सकते हैं। अच्छे इंस्टीट्शन होगा, तो कोई भी बाहर क्यों जाना चाहेगा। यहां का जो पैसा बाहर जाता है, वह यहीं रह जायेगा। हेल्थ के सेक्टर में भी हम देखते हैं कि बहुत सारे लोग बाहर जा रहे हैं। सब साउथ की तरफ जाते हैं इलाज के लिए। अगर झारखंड में अच्छी स्वास्थ्य सुविधा हो तो फिर लोग बाहर जायेंगे नहीं, बाहर से लोग यहां आयेंगे। यहां की इकोनॉमी अटोमेटिक बढ़ेगी।

सवाल: इसके लिए क्या पांच साल काफी होंगे?
जवाब: हां, बिल्कुल पांच साल काफी हैं। डेमोक्रेसी में किसी भी काम को अंजाम देने के लिए पांच साल का ही समय दिया गया है। कोई बिल्डिंग बनाने में एक-डेढ़ साल लगता है। हमें लगता है कि पांच साल बहुत काफी समय है।
सवाल: 2004 में जब लोकसभा चुनाव हुआ था, उस वक्त भाजपा की तरफ से सिर्फ आप ही जीते थे, बाकी सब लोग हार गये थे। उसका क्या रीजन था सबकी हार का, आपकी जीत का?
जवाब: देखिये रीजन तो यही था कि उस समय अपोजिशन के लोग इकट्ठे हो गये थे। दूसरा तो कुछ भी नहीं था मेरी समझ से।

सवाल: आप शुरू से दुमका से लड़ते रहे, लेकिन फिर आप कोडरमा चले गये। इस बदलाव का कारण क्या था?
जवाब: बदलाव का कारण इतना ही था कि दुमका से जब हम चुनाव लड़े 1998-99 में तो बड़ा ही मामूली वोट से हम जीते थे। क्योंकि वहां लड़ाई बहुत टफ होती है। जेएमएम और बीजेपी के बीच में। 2004 में चुनाव लड़ने की बात हो रही थी, तो पार्टी की इच्छा थी कि हम दुमका से ही चुनाव लड़ें, लेकिन हमारी इच्छा थी कि हमारा घर चूंकि पड़ता है कोडरमा लोकसभा क्षेत्र में, तो हमें यहां से लड़ना चाहिए। फिर पार्टी मेरी बात को मान गयी कि चलो ठीक है। इतना ही था बस। हम यह भी सिद्ध करना चाहते थे कि हम चुनाव कहीं से भी लड़ कर जीत सकते हैं। दूसरा हम यह कहना भी चाहते थे कि हम तो अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ कर जीते, शिबू सोरेन भी अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ कर दिखायें। उनका क्षेत्र तो रामगढ़ है। इसीलिए आपने देखा होगा कि जब हम मुख्यमंत्री बने, तो रामगढ़ से चुनाव लड़े। यह जनरल सीट थी। हम बताना चाहते थे कि हम सबके नेता हैं। 2004 में जब लोकसभा का चुनाव लड़ना था, तो वह भी जनरल सीट थी। पार्टी को लग रहा था कि कोडरमा से लड़ना रिस्क हो जायेगा, तो हमने कहा कि रिस्क नहीं होगा, हम जीतेंगे। जब हम मुख्यमंत्री थे, तो कोडरमा क्षेत्र में बहुत ज्यादा काम किया था। हमने उतना काम किया था, जितना लोगों ने कल्पना भी नहीं की थी। जब हम कोडरमा से चुनाव लड़े, जीते 2004, 2006 और 2009 में। राजनीति में हम इस मिथक को भी तोड़ना चाहते थे कि लड़ना है तो कहीं से भी लड़ सकते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद जब बाइ इलेक्शन में रामगढ़ से चुनाव लड़ने की बात हुई, तो कैलाशपति मिश्र हमको बहुत मना किये। उन्होंने कहा कि बहुत रिस्क है। मैंने कहा कि हमको रिस्क में ज्यादा मजा आता है। उन्होंने कहा कि हार जाने पर पता है न क्या करना पड़ेगा। मैंने कहा कि मुख्यमंत्री पद से रिजाइन करना पड़ेगा और क्या होगा। हम लड़े और जीत गये।

सवाल: झारखंड के युवाओं के लिए संदेश।
जवाब: नौजवानों से यह कहेंगे कि आप सबको मेहनत करनी चाहिए। परिश्रम करना चाहिए। यों ही समय नहंी गंवाना चाहिए। चूंकि आजकल नौजवानों में देखते हैं कि कुछ नौजवानों में यह बीमारी होती है कि वे यों ही समय को गंवा देते हैं। आप कुछ भी करें, लेकिन कुछ करना चाहिए। कवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा है न, नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो। जग में रह कर कुछ काम करो।

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