चंद्रशेखर की विरासत के प्रहरी नीरज शेखर

कहते हैं: बलिया मेरा मान है, सम्मान है, अभिमान है, परिवार है

नीरज शेखर सिर्फ उत्तरप्रदेश से भाजपा के राज्यसभा सांसद ही नहीं हैं। वह सिर्फ भारत के यशस्वी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे ही नहीं हैं। वह उस बागी बलिया की विरासत को सहेज कर रखनेवाले प्रहरी भी हैं, जिसका नेतृत्व चंद्रशेखर ने संसद में आठ बार किया। नीरज शेखर वह शख्स हैं, जो आज भी चंद्रशेखर के तेज, प्रताप, जन सरोकार, उनकी आभा और साफगोई को जीवित रखे हुए हैं, अपनी सोच में, समझ में, विचार में, आचरण और बोलचाल में। भारत की राजनीति में यह परिपाटी रही है कि किसी राजनेता के पुत्र या पुत्री को उसके काम से अधिक उसके माता-पिता के नाम से पहचाना जाता है, लेकिन नीरज शेखर इसके अपवाद हैं। वह अपने महान पिता चंद्रशेखर की विरासत को संभाल रहे हैं, लेकिन कभी उनके नाम का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि उनके संस्कार अपने खानदान के सम्मान को बरकरार रखने की शिक्षा देते हैं। आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह ने जब उनसे मुलाकात के लिए समय मांगा, तो नीरज शेखर सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने बेबाक ढंग से सवालों के जवाब दिये और कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अपने महान पिता की उपलब्धियों को कैश कर रहे हैं। प्रस्तुत है नीरज शेखर से मुलाकात और बातचीत का ब्योरा।

देश की राजधानी दिल्ली का गुरुद्वारा रकाबगंज मार्ग। तारीख सात सितंबर। सुबह के करीब सवा दस बजे हैं। मैं उस सरकारी आवास के सामने खड़ा हूं, जो कभी देश की राजनीति की दिशा तय करता था। उस आवास के गेट पर आज भी मोटे अक्षरों में लिखा है, चंद्रशेखर। उसके नीचे छोटे अक्षरों में लिखा है, नीरज शेखर। अंदर लगभग तीस मीटर जाने पर कार्यालय लिखा एक कमरा दिखाई पड़ता है। अंदर का दृश्य खुद-ब-खुद यह कह देता है कि इस आवास में कभी चंद्रशेखर बैठते थे। दरअसल, छह सितंबर को मैं उस सड़क से गुजर रहा था। अचानक मेरी नजर उस आवास के गेट पर लिखे शब्दों पर पड़ी। चंद्रशेखर और फिर नीरज शेखर। मैंने फोन कर उनसे मिलने का वक़्त मांगा था। कहा था, मैं झारखंड से हूं और पत्रकारिता में अभी नया-नया आया हूं। बलिया के पास ही मेरा गांव है। उन्होंने कहा, आप अगले दिन सुबह साढ़े दस बजे आ जायें। मैं स्तब्ध था। कारण चंद्रशेखर की विरासत संभालनेवाली शख्सियत से मैं पहली बार फोन पर बात कर रहा था। और इतनी आसानी से उन्होंने अगले दिन मुझे बुला लिया। मैं अगले दिन तय समय पर गया। आॅफिस में घुसते ही देखा कि चार लोग पहले से मिलने के लिए बैठे हैं। मैं सोफे पर बैठ गया। फिर जब दीवारों पर नजर दौड़ायी, तो मेरी नजरें ठहर सी गयीं। इस कमरे में अब भी चंद्रशेखर का आभास कायम था। एक तस्वीर पर नजर पड़ी। चंद्रशेखर जी के डाक टिकट को बड़ा कर एक फ्रेम में संवार कर रखा गया था। फिर दाहिनी ओर नजर दौड़ायी, तो आलमारी में चंद्रशेखर द्वारा लिखी और उनके ऊपर लिखी किताबों को देखा।

कुछ इस तरह हुई मुलाकात की शुरूआत
नीरज शेखर के आवासीय कार्यालय के प्रतीक्षा रूम का गेट खुला। कप में चाय आयी और मैंने पी भी, कोरोना का डर भी था, लेकिन चूंकि यह मेरे जिले के सांसद की चाय थी, सो मना नहीं कर पाया। फिर एक पचपन साल के सज्जन कमरे में आये और कहा कि राकेश सिंह कौन हैं। मेरे हां कहने पर उन्होंने कहा कि सांसद जी याद कर रहे हैं। मैं उनसे मिलने उनकी केबिन में गया। बातचीत का दौर शुरू हुआ। मैंने कहा कि मैं एक पत्रकार हूं, रांची में रह रहा हूं। बलिया के पास ही मेरा गांव भी है। दिल में इच्छा जगी और आपको फोन कर लिया। मैं आश्चर्यचकित भी था कि आपका नंबर इतनी आसानी से उपलब्ध भी हो गया और आपसे ही डायरेक्ट बात भी हो गयी। नीरज कहते हैं, यह नंबर बहुत पुराना है, मुझे लगता है, इंसान को फोन नंबर और अपना आचरण कभी नहीं बदलना चाहिए। जिस समय नीरज शेखर यह बोल रहे थे, उसी समय मेरी नजर उनके कमरे में लगी उस तस्वीर की तरफ गयी, जिसमें वह मुलायम सिंह यादव के साथ गुफ्तगू करते दिख रहे थे। उसी तस्वीर के ठीक ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी दो तस्वीरें दो अलग एंगल से फ्रेंम की हुई थीं। आज के मौजूदा दौर में अगर नीरज शेखर की जगह दूसरा कोई सांसद होता और उसने दल बदला होता, तो मुलायम सिंह यादव के साथ की तस्वीर को अपने कमरे से हटा दिया होता।

….और सवालों का सिलसिला चल निकला
मैंने नीरज शेखर से कहा, मैं आपसे चंद सवाल करना चाहता हूं। यह सवाल मेरी जिज्ञासा भी है।
उन्होंने स्वीकारोक्ति दी। मैंने उनसे पूछा कि आपके पिता चंद्रशेखर जी बलिया का कुल आठ बार संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके थे और अब आप इस विरासत को आगे बढ़ाने को लालायित हैं। इस दौरान ना तो बलिया की जनता ने कभी अपने नेता चंद्रशेखर को छोड़ा और ना ही चंद्रशेखर ने बलिया की जनता को। आपके लिए बलिया और उसकी जनता क्या है?

यह प्रश्न सुनते ही नीरज शेखर बहुत भावुक हो गये। उनके मुंह से जो पहला शब्द निकला, वह था परिवार। वह कहते हैं कि बलिया की जनता मेरा परिवार है, मेरा मान है, अभिमान है, सम्मान है। जो स्नेह बलिया ने मेरे पिता को दिया, वही स्नेह आज भी मुझे मिल रहा है। मैं बलिया की जनता का हमेशा ऋणी रहूंगा। जब मैं वहां से चुनाव लड़ रहा था, तो विरोधी कहते थे कि ये दिल्ली वाला है। इसे बलिया के बारे में क्या पता। चुनाव अगर जीत भी गया तो वह दिल्ली में ही रहेगा, जनता के बीच नहीं। यहां ये उल्लेख करना जरूरी है कि चंद्रशेखर के निधन के बाद जब बलिया लोकसभा सीट पर 2007 में उपचुनाव हुआ। उसमें नीरज शेखर ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की थी।

चंद्रशेखर एक जननेता ही नहीं, विजनरी थे
मैंने उनसे दूसरा सवाल किया: जब 56 वर्ष की उम्र में चंद्रशेखर वर्ष 1983 में छह जनवरी से लेकर 25 जून तक छह महीने की पदयात्रा पर रहे, 4260 किलोमीटर पैदल ही कन्याकुमारी से लेकर दिल्ली के राजघाट तक चले, उस समय की आपकी जेहन में क्या यादें हैं?

नीरज जी हल्का मुस्कुराते हैं। कहते हैं, मेरी उम्र उस वक़्त लगभग 15 या 16 वर्ष की थी। बहुत लोग इस पदयात्रा के खिलाफ थे। घर पर भी सभी चिंतित थे, लेकिन चंद्रशेखर जी धुन के पक्के थे। वह जो ठान लेते थे, वही करते थे। यह पदयात्रा कई मायनो में अनोखी थी। इस पदयात्रा के दौरान चंद्रशेखर जी ने देश के राजनीतिक हालात को बहुत अच्छे से समझा। देश में मौजूद जन समस्याओं को करीब से देखा और समझा। वहां के लोगों और उनकी संस्कृति से भी परिचित हुए। एक उत्तरप्रदेश का नेता तमिलनाडु की समस्या को समझ रहा था। इस पदयात्रा के दौरान पिताजी ने पाया कि भारत में कुपोषण की स्थिति चरम पर थी। कुपोषण मामले में भारत पहले पायदान पर खड़ा था। उन्होंने यह भी पाया कि भारत के गांवों में गर्भवती महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। उनके या परिवार के अंदर जागरूकता का अभाव है। स्वास्थ्य सुविधा उनके अनुरूप नहीं है। वहीं इस यात्रा के दौरान चंद्रशेखर जी ने देखा कि शिक्षा की स्थिति भी बहुत दयनीय है। इस यात्रा के समय ही चंद्रशेखर जी ने कह दिया था कि भारत आनेवाले दिनों में जल की समस्या से बुरी तरह जूझेगा। दरअसल, चंद्रशेखर एक राजनेता के साथ-साथ समाज के सजग प्रहरी भी थे और उनमें स्पष्ट विजन भी था।

राजनीतिक माइलस्टोन थी चंद्रशेखर की पदयात्रा
इस यात्रा के बारे में थोड़ी और जानकारी देना जरूरी है। चंद्रशेखर उस वक़्त जनता पार्टी के प्रेसीडेंट थे। जिस दिन उन्होंने इस पदयात्रा की शुरूआत की, उसी दिन उनकी पार्टी कर्नाटक में सत्ता में आयी। चंद्रशेखर ने कन्याकुमारी से दिल्ली स्थित महात्मा गांधी की समाधि राजघाट तक पदयात्रा की। चंद्रशेखर की इस पदयात्रा से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी भयभीत हो गयी थीं। चंद्रशेखर ने 6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 के बीच 4260 किमी की रिकॉर्ड पैदल यात्रा की। इस पैदाल यात्रा का उद्देश्य आम लोगों की समस्याओं को करीब से जानना, समझना था। महात्मा गांधी की तरह अपने पैरों से हिंदुस्तान को नाप कर अगर किसी ने मानस को परखा तो वे चंद्रशेखर ही थे। उस पदयात्री की राजनीति में ना धर्म था, ना जाति थी। बस भारत के बुनियादी मुद्दों को समझने की ललक थी। सबको पीने का पानी, हर व्यक्ति को कुपोषण से मुक्ति, हर बच्चे को पढ़ाई का हक, हर इंसान को स्वास्थ्य का अधिकार और मनुष्य मात्र की गरिमा की रक्षा, जिसे उन्होंने सामाजिक समरसता का नाम दिया। उन्होंने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश तथा हरियाणा सहित देश के तमाम कार्यकर्ताओं को देश की जमीनी हकीकतों और समस्याओं से अवगत कराने के लिए तथा उसके समाधान का प्रशिक्षण देने के लिए लगभग 15 भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की थी।

बात करते-करते नीरज शेखर पूरी तरह से उस दौर में चले गये थे। वह 1984 में हुए आॅपरेशन ब्लू स्टार का भी जिक्र करते हैं। वह उस दौरान हुए दंगों के बारे में बताते हैं। वह कहते हैं कि चंद्रशेखर जी ने धारा के विरुद्ध जाकर उस वक़्त कहा था कि यह गलत हुआ था। यह चंद्रशेखर ही थे, जो इतनी बेबाकी के साथ अपनी बातें रख सकते थे। न झिझक और न ही किसी प्रकार का डर।

मोदी के काम का कायल हूं, योगी ने लंबी लकीर खींची है
मैंने एक सवाल दागा कि आप 2019 में सपा छोड़ भाजपा में क्यों शामिल हो गये?
नीरज शेखर का जवाब: मैं देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के काम से काफी प्रभावित था। उनका काम गांव-गांव, टोले-टोले में दिख रहा था। उनके द्वारा बनायी गयी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति तक पहुंच रहा था। इस प्रकार से काम होता देख मुझे अंदर से कहीं न कहीं इस मुहिम से जुड़ने की इच्छा हिलोर मार रही थी। फिर मैंने मन बना लिया और 16 जुलाई 2019 को नरेंद्र भाई मोदी के नेतृत्व में विश्वास जताते हुए भाजपा में शामिल हो गया। मुझे राज्यसभा में भाजपा की तरफ से भेजा गया।

मैंने नीरज शेखर से पूछा : जब 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आयी और 2017 में उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। इस दरम्यान क्या बदलाव उत्तरप्रदेश में आपको देखने को मिला? इस सवाल के जवाब में उनका कहना था कि मैं ये नहीं कहूंगा कि सपा बुरी है। या सपा के शासन काल में बिल्कुल काम नहीं हुआ। मेरा यह नेचर नहीं है कि मैं किसी भी दल की बुराई करूं और खासकर पहले मैं जिस दल में रह चुका हूं। हां विचारों में मतभेद हो सकते हैं। काम करने न करने के क्रम में कुछ भेद पैदा हो सकते हैं। नीतियों के कार्यान्वयन को लेकर विरोध हो सकता है। इन सबको हमने कुछ-कुछ महसूसा। हां, उत्तरप्रदेश की योगी जी की सरकार के बारे में इतना कह सकता हूं कि इस सरकार ने जन सरोकार से अपने को जोड़ा है। योगी जी ने कुछ समस्याओं को काफी सलीके से निबटाया है। कोरोना काल में उत्तरप्रदेश की सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है। खासकर दूसरी लहर में जिस तरह की आपाधापी पूरे देश में मची हुई थी और इसने जिस तरह से उत्तरप्रदेश को अपने आगोश में ले लिया था, उससे काफी चिंताएं हो रही थीं, लेकिन योगी जी की दृढ इच्छाशक्ति और कोरोना के पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने जिस तरह से सभी कमिश्नरी का दौरा किया, उससे प्रशासन की सक्रियता बढ़ गयी और कोरोना के प्रकोप पर काबू पाया गया। उन्होंने कहा कि हमें जब-जब अवसर मिला है, बलिया के विकास के लिए हमने पूरा प्रयास किया है। सड़क, बिजली, पानी, पुल-पुलिया के मामले में काफी कुछ हुआ है और कुछ काम अब भी अधूरे हैं। उन्हें पूरा करने के लिए प्रयासरत रहूं। उन्होंने कहा कि कोरोना के प्रकोप के पहले बलिया में आॅक्सीजन प्लांट की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन आज की तारीख में बलिया में आठ आॅक्सीजन प्लांट स्थापित हो गये हैं। कुछ और पाइपलाइन में हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। अब तो गांव-गांव में संचार माध्यमों का जाल बिछाने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है। रेल मार्ग में काफी सुगमता आयी है। ट्रेनों का आवागमन बढ़ा है। उज्ज्वला योजना, आयुष्मान योजना के तहत गरीबों के घर-घर तक सुविधाएं पहुंच रही हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ऐसे-ऐसे परिवारों को आवास मिला है या मिल रहा है, जिनके लिए आवास कभी सपना ही था। उन्होंने कहा कि हम कह सकते हैं कि भले ही किसी पार्टी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान नारा रहा हो, लेकिन मोदी जी की अगुवाई में केंद्र सरकार ने इसे हकीकत में बदल दिया है। गरीबों को राशन, तन ढंकने का कपड़ा, सिर छिपाने को आवास, पढ़ाई से लेकर विदाई तक में गरीबों को मदद मिल रही है। सरकारी मदद के सहारे अब गरीबों के बच्चे भी डॉक्टर और आइएएस-आइपीएस बनने का सपना देख रहे हैं और उस देहरी को लांघ भी रहे हैं। माझी पुल को लेकर नीरज शेखर काफी प्रयासरत हैं। कहते हैं, काम हो रहा है, वह अवश्य पूरा होगा। बातचीत में उन्होंने ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस वे के बारे में जानकारी दी। कहा कि इस एक्सप्रेस वे के बन जाने से बलिया का देश के अन्य हिस्सों से आवागमन और सुगम हो जायेगा। दूरी भी काफी कम हो जायेगी। यह सड़क गाजीपुर से बलिया होते हुए बिहार के मांझी तक जा रही है। इस एक्सप्रेस वे की खासियत यह है कि यह बलिया सदर के 73 और बैरिया के 14 गांवों से होते हुए जायेगी। यानी ये सभी गांव रातोंरात मुख्यधारा में आ जायेंगे। बातचीत में मुझे यह आभास हो गया कि नीरज शेखर बलिया लोकसभा के चप्पे-चप्पे और गांव के मुखिया तक से वाकिफ हैं। वह करनछपरा के सुखारी सिंह से लेकर रामानुज सिंह, वहां के मंदिर शिवालय से लेकर अन्य धार्मिक स्थल और विद्यालयों तक से वाकिफ हैं। वह बैरिया के तमाम लोगों को नाम से जानते हैं, तो चितबड़ा गांव के तेजबहादुर सिंह से लेकर लोचन सिंह और पातेपुर के मुरली सिंह से लेकर उदय प्रताप तक को जानते हैं। आप कह सकते हैं कि बलिया उनके रग-रग में बसता है। बलिया के लोग उनके मन मस्तिष्क में हैं।

पीढ़ियां गुजर जाती हैं, जब एक चंद्रशेखर पैदा होता है

देश ही नहीं, विश्व की भी नजर में चंद्रशेखर एक हाड़-मांस के इंसान मात्र नहीं थे। वह एक आदर्श थे, युवा पीढ़ी के रोल मॉडल थे, एक आंदोलन थे। वह युवाओं के पथ-प्रदर्शक थे। उनकी राजनीतिक शुचिता के सभी कायल थे। उन्होंने अपनी सोच-समझ से देश के एक बड़े वर्ग के मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ी थी। वह खुद में एक परिवर्तन थे, एक बदलाव थे, जो भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदलने की क्षमता रखते थे। चंद्रशेखर में जोश, जज्बा और माद्दा कूट-कूट कर भरा था। उनके बारे में अगर यह कहा जाये कि वह राजनीतिक क्षितिज पर धु्रव की तरह हमेशा आभा बिखेरनेवाला तारा थे, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनकी इसी विशिष्टता ने बलिया जैसी विशुद्ध ग्रामीण माटी से निकलनेवाले चंद्रशेखर को भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया। वे सिर्फ भारत के आठवें प्रधानमंत्री ही नहीं रहे, बल्कि अल्प समय में ही उन्होंने उस कुर्सी की एक ऐसी चमक बिखेरी, जिसे लोग आज भी याद करते हैं। हर व्यक्ति आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लेता है। चंद्रशेखर की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा लीजिए कि उसने उन्हें सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया। इस दौरान उन्होंने यह भी बता दिया कि कुर्सी के लिए वह अपने स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं कर सकते। अपने आदर्श, नैतिकता और कर्तव्यबोध की तिलांजलि नहीं दे सकते। उनका कार्यकाल 10 नवंबर 1990 से लेकर 21 जून 1991 तक ही रहा। राजीव गांधी के समर्थन के बाद 64 सासंदों के समर्थन से चंद्रशेखर ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और 10 नवंबर 1990 को भारत के आठवें प्रधानमंत्री के पद की शपथ ली थी। भारत के आठवें प्रधानमंत्री के रूप में ही सिर्फ उनकी पहचान नहीं थी। वह ऐसे नेता थे, जिन्हें दल की दीवार में बांध कर नहीं रखा जा सकता था। वह अपना रास्ता खुद तय करते थे। उस रास्ते पर चलने के लिए वह अपनी चाल खुद तय करते थे। चंद्रशेखर की रगों में बागी बलिया का गरम खून था। स्वाभिमानी चंद्रशेखर किसी की कठपुतली बन कर रह ही नहीं सकते थे। कांग्रेस की मदद से वह प्रधानमंत्री बने। लेकिन कुछ दिनों बाद ही जब उनके काम में कांग्रेस का हस्तक्षेप शुरू हो गया, तो चंद्रशेखर को लगा कि कांग्रेस कुर्सी की कीमत मांग रही है। जबकि इस पद पर बने रहने के लिए वह कांग्रेस के इशारों पर थिरक नहीं सकते थे। कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने की कानाफूसी के बीच ही चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि वह प्रधानमंत्री पद का बहुत सम्मान करते हैं, इसका अपमान उन्हें बर्दाश्त नहीं और वह एक दिन में तीन बार अपने विचार नहीं बदलते। चंद्रशेखर की इस खुद्दारी से कांग्रेस हक्का-बक्का रह गयी थी।
मैंने चंद्रशेखर को कभी नहीं देखा था, क्योंकि उस समय मेरी उम्र ही क्या रही होगी। अबोध था। किताबों में पढ़ कर पता चला कि चंद्रशेखर खुद एक पत्रकार थे, उनकी लेखनी के लोग कायल थे। उनका बेबाक लेखन लोगों को आकर्षित करता था। उन्हें पढ़ कर आपको एहसास होगा कि शब्द को कागज पर उकेरने को लेकर वह कितना सजग थे। उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये शब्द कितने प्रशावभाली थे। वे शब्द लोगों के मानस पटल पर क्या अमिट छाप छोड़ते थे। विशेष और विशेषण का पुट गजब का था। लेखनी में गांव की माटी की सुगंध और भाषा में मिठास अलग ही एहसास कराती थी। उन्होंने 1969 में ‘यंग इंडियन’ नाम से साप्ताहिक पत्रिका भी निकाली थी। उस दौर में उसका एडिटोरियल पेज बहुत चर्चित हुआ करता था। जून 1975-मार्च 1977 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की कुदृष्टि पड़ी और उनकी पत्रिका और युवा तुर्क कहे जानेवाले चंद्रशेखर दोनों को बंद कर दिया गया था। आपातकाल के बाद यह साप्ताहिक पत्रिका फरवरी 1989 तक निकलती रही और चंद्रशेखर एडिटोरियल एडवाइजरी बोर्ड के चेयरमैन रहे। उन्होंने बहुत सी किताबें भी लिखी हैं। जैसे मेरी जेल डायरी, डायनामिक्स आॅफ सोशल चेंज इत्यादि। कहा जाता है कि 1967 में कांग्रेस संसदीय दल का महासचिव बनाये जाने के बाद चंद्रशेखर ने तेज सामाजिक बदलाव लाने वाली नीतियों पर जोर दिया। उन्होंने उच्च वर्गों के बढ़ते एकाधिकार के खिलाफ आवाज उठायी। इसके बाद सत्तासीनों से उनके गहरे मतभेद होने शुरू हुए। फिर उन्हें युवा तुर्क की संज्ञा दी जाने लगी, जिसने दृढ़ता, साहस और ईमानदारी के साथ निहित स्वार्थों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जो चल रही व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए निष्ठावान रहे। इसी युवा तुर्क के रूप में, जिसका जिक्र मैंने किया, उन्होंने 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का चुनाव लड़ा और जीते भी। क्या आज के जमाने में किसी भी दल के नेता में यह साहस है कि अपने दल के सर्वेसर्वा की मनाही के बाद भी अपनी पार्टी में चुनाव लड़ने के लिए खड़ा हो और जीत जाये। उसके बाद वह अपनी पार्टी में उसी मजबूती के साथ जमे रहे।

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