सोचने की जरूरत : झारखंड के सरकारी स्कूलों पर डॉ रामेश्वर उरांव का बयान और विवाद

केवल टिप्पणी कर पल्ला नहीं झाड़ सकते, व्यवस्था सुधारने की भी जिम्मेदारी

झारखंड सरकार के वरिष्ठतम मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने राज्य के सरकारी स्कूलों की हकीकत पर टिप्पणी कर मानो बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया है। विरोधी दलों से लेकर सरकारी स्कूलों के शिक्षकों तक उनके खिलाफ उतर गये हैं और अलग-अलग तरीके से उनकी खिलाफत कर रहे हैं। डॉ. उरांव का बयान गलत या सही यह बहस का विषय नहीं है। सवाल है बच्चों के शिक्षा की। झारखंड में सरकारी स्कूलों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यहां किसी नेता, अधिकारी यहां तक कि मध्यम वर्ग के परिवार के बच्चे नहीं पढ़ते हैं। यहां बेहद गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चे ही पढ़ने आते हैं। जिन्हें उस लायक बनाना है कि वह अपने से उच्चवर्ग के बच्चों के साथ भविष्य में कंधा मिला सकें। सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति के लिए केवल शिक्षकों को दोषी ठहरा देने से समस्या का हल नहीं निकल आयेगा। इसके लिए शिक्षक ही दोषी हैं, यह भी नहीं कहा जा सकता है। अगर गौर करें तो ऐसा नहीं है कि शिक्षकों को पढ़ाना नहीं आता। या सभी शिक्षक अक्षम ही हैं। कुछ अपवाद को छोड़ दें तोज्यादातर शिक्षक प्रतियोगिता परीक्षा पास कर ही इस क्षेत्र में आये हैं। अगर वह स्कूलों में नहीं पढ़ा रहे, या बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही है, तो इसके कारण को तलाशना होगा। क्योंकि वही शिक्षक सरकारी आदेश पर बच्चों को पढ़ाने की जगह अन्य कार्यों में आठ घंटे-दस घंटे इमानदारी से ड्यूटी तो देते ही हैं। दरअसल यह व्यवस्था का दोष है, जो एक दिन में नहीं हो गया है। देश भर में सरकारी स्कूलों को योजनाबद्ध तरीके से बर्बाद कर निजी स्कूलों को बढ़ावा दिया गया, लेकिन दिल्ली, ओड़िशा, केरल और असम सरीखे राज्यों ने जिस तत्परता से अपनी स्कूली शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प किया, उससे झारखंड को सीख लेने की जरूरत है। डॉ रामेश्वर उरांव मौजूदा सरकार के वरिष्ठ मंत्री हैं। केवल सरकारी स्कूल की दुर्दशा पर बयान दे कर वह जिम्मेदारी से नहीं बच सकते हैं। आखिर जो कमियां हैं, उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी भी तो सरकार की ही है। आखिर दिल्ली समेत कई राज्यों ने अपने स्कूलों की स्थिति को सुधारा है न। यह वहां की सरकार ने ही किया। तो फिर यह झारखंड में क्यों नहीं हो सकती? सरकारी स्कूलों की व्यवस्था पर टिप्पणी करने की बजाय उसमें सुधार के उपायों पर गंभीरता से सोचना चाहिए। डॉ उरांव की टिप्पणी की पृष्ठभूमि में झारखंड के सरकारी स्कूलों की हकीकत को रेखांकित करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की विशेष रिपोर्ट।

झारखंड सरकार के सबसे उम्रदराज और अनुभवी मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने सरकारी स्कूलों को लेकर जो टिप्पणी की है, उससे शिक्षक समुदाय नाराज हो गया है। राजनीतिक विरोधियों ने भी उनकी टिप्पणी को अनुचित करार दिया है। डॉ उरांव ने कहा था कि झारखंड की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को निजी स्कूलों ने पटरी पर बनाये रखा। यदि ये स्कूल नहीं होते, तो व्यवस्था ध्वस्त हो गयी होती। इसके बाद उन्होंने कह दिया कि वह न कभी सरकारी स्कूल में पढ़ने गये और न उनके खानदान से कोई जायेगा। उनका यह बयान उस कड़वी हकीकत का आइना है, जो आज भी झारखंड भुगत रहा है। राज्य के सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। पिछले 21 साल में इस व्यवस्था को सुधारने के लिए कई कदम उठाये गये, लेकिन न तो इसका अपेक्षित परिणाम निकला और न ही किसी ने इस पर गंभीरता ही दिखायी। कुछ गिने-चुने स्कूलों को छोड़ दें, तो झारखंड के सरकारी स्कूलों की पढ़ाई राष्ट्रीय औसत में हमेशा निचले पायदान पर ही रही है।

इस बदहाल व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन है, यह तय करने से पहले इस बात पर विचार करना जरूरी है कि यह स्थिति पैदा ही क्यों हुई। जिस तरह पूरे देश में एक सुनियोजित अभियान चला कर सरकारी नगरीय परिवहन व्यवस्था को चौपट किया गया, उसी तरह स्कूली शिक्षा व्यवस्था को भी जान-बूझ कर इस अवस्था में लाकर छोड़ दिया गया। पिछली शताब्दी तक सरकारी स्कूलों की व्यवस्था कितनी ठोस और सुगठित थी, यह बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन धीरे-धीरे इस व्यवस्था को खोखला किया गया और तब स्कूली शिक्षा का अंधाधुंध व्यावसायीकरण हुआ। इसका परिणाम हुआ कि सरकारी स्कूल पिछड़ते गये। सरकारी शिक्षकों को पता चल गया कि उन्हें पढ़ाने के अलावा सारा काम करना है। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव कराने तक और पशुगणना से लेकर टीकाकरण तक के सरकारी काम उन्हें ही करना है। इसलिए वे भी पढ़ाने के प्रति निश्ंिचत हो गये। शिक्षकों की निगहबनी हटी, तो बच्चे भी स्वच्छंद हो गये। रही-सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी। बच्चों को स्कूल जाने से ही फुर्सत मिल गयी।

यह हकीकत है, लेकिन इस विपरीत परिस्थितियों में दिल्ली, केरल, असम और ओड़िशा जैसे राज्यों ने संकल्प शक्ति दिखायी और अपनी सरकारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था के पुराने गौरवशाली दिन लौटा दिये। झारखंड ने कागजों पर खूब काम किया, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हुआ। शिक्षकों की नियुक्ति हो गयी, लेकिन बच्चों तक किताबें नहीं पहुंचीं। किताबें पहुंच गयीं, तो स्कूल की इमारत ही नहीं बनी। कहीं केवल पारा शिक्षकों के भरोसे स्कूल है, तो कहीं कई विषयों के शिक्षक ही नहीं हैं। स्कूल, शिक्षक और छात्र का अनुपात गड़बड़ है। कहीं शिक्षक हैं, तो बच्चे नहीं हैं। कहीं बच्चे हैं, तो शिक्षक नहीं हैं। सब कुछ ठीक हुआ, तो पारा शिक्षकों का आंदोलन रास्ते का रोड़ा बन गया। झारखंड में भविष्य की तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।

डॉ रामेश्वर उरांव की टिप्पणी को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह जरूर है कि सरकार का अंग होने के नाते इस व्यवस्था में सुधार की जिम्मेदारी भी उनकी ही है। आज भी झारखंड में ऐसे सरकारी शिक्षकों की कमी नहीं है, जो केवल पढ़ाने में लगे हुए हैं। इसलिए पहली जरूरत यहां की व्यवस्था को सुधारने की है। शिक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी समझने के लिए झारखंड को तैयार करना होगा, जैसा कि सोमालिया में किया गया। सोमालिया के बाकूल नामक प्रांत में अपनायी गयी शिक्षा व्यवस्थाअद्भुत है। वहां की सरकार ने तय किया कि राज्य के टॉपर बच्चों के लिए एक अलग स्कूल खोला जायेगा। इस प्रांत में हाइ स्कूल की परीक्षा के सभी टॉपर बच्चों को इस स्कूल में दाखिला मिलता है और उनकी प्रतिभा को तराशा जाता है। आगे चल कर यही बच्चे दुनिया भर में अपना नाम रोशन करते हैं। दुनिया की कई प्रमुख संस्थाओं में इनकी तूती बोलती है। इतना ही नहीं, अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों की सरकारों में भी बाकूली सलाहकार बनते हैं। लगभग यही मॉडल दुनिया भर में चर्चित सुपर 30 ने भी अपनाया है, जहां आनंद उन प्रतिभाओं को तराशते हैं, जो गरीब और पिछड़े हैं। बाद में यही बच्चे आइआइटी में दाखिला पाते हैं। झारखंड में भी यह मॉडल बखूबी अपनाया जा सकता है। सभी टॉपरों के लिए एक अलग स्कूल बना दिया जाये, जहां उन्हें अच्छे शिक्षक मिल सकें और अच्छी सुविधाएं मिलें, ताकि वे आगे चल कर अपना और राज्य का नाम रोशन कर सकें। यदि झारखंड में भी यह व्यवस्था लागू हो जाये, तो देश भर में एक मिसाल कायम की जा सकती है। इससे यहां की प्रतिभाएं बाहरी दुनिया की भीड़ में जाकर अपना वजूद नहीं खो देंगी और दूसरी तरफ इन बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित हो सकेगा। इसका सकारात्मक संदेश दूसरे बच्चों में भी जायेगा, जो आगे चल कर इस स्कूल में पढ़ना चाहेगा।

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