राष्ट्रपति चुनाव ने बेपर्द किया झारखंंड कांग्रेस को

  • सियासत : झारखंड में अपने 18 विधायकों को भी एकजुट नहीं रख पाया प्रदेश नेतृत्व

हिंदुस्तान में राष्ट्रपति के चुनाव ने जहां दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीतिक धारा को एक ठोस स्वरूप प्रदान किया है, वहीं इसने कई मिथक भी गढ़े हैं। इन मिथकों में सबसे प्रमुख है झारखंड में कांग्रेस विधायकों की क्रॉस वोटिंग। राज्य के 18 में से 10 कांग्रेसी विधायकों ने पार्टी निर्णय के खिलाफ जाकर भाजपा की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को वोट दिया। वैसे तो राष्ट्रपति चुनाव में ह्विप नहीं जारी होता है, लेकिन यह सुनने में भी अजीब लगता है कि अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार की बजाय विपक्ष का समर्थन किया जाये। दरअसल झारखंड कांग्रेस की यह स्थिति राज्य में पार्टी संगठन के खोखलेपन का परिचायक है। प्रदेश प्रभारी से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष क्या कर रहे हैं और पार्टी कहां जा रही है। लगता है, इससे कांग्रेसियों का कोई वास्ता नहीं रह गया है। हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस की यह हालत केवल झारखंड में नहीं है, बल्कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी इन दिनों बड़ी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। 135 साल पुरानी कांग्रेस आज एक बार फिर दोराहे पर आकर खड़ी हो गयी है। अपने स्थापना काल के बाद सबसे बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस को अब अपना रास्ता चुनने की चुनौती है। पार्टी के पुराने और अनुभवी नेता बार-बार नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि इस पार्टी को वंशवाद की परंपरा से मुक्त करो। उनका यह भी कहना है कि गांधी परिवार आज अपने में इस तरह घिर गया है कि उसे देश के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं है। यही कारण है कि वह गलत निर्णय लेने लगा है। राष्टÑपति चुनाव में पार्टी लाइन से अलग जाकर झारखंड में कांग्रेस के जिन 10 विधायकों ने द्रौपदी मुर्मू को वोट किया, उनमें से कुछ विधायकों ने चुनाव से एक सप्ताह पूर्व यह जता दिया था कि वे भी झारखंड की राज्यपाल रहीं और देश की पहली आदिवासी महिला के पक्ष में मतदान कर बन रहे इतिहास का हिस्सा बनना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर पार्टी लाइन से अलग जाकर मतदान किया। ये विधायक बातचीत में दबी जुबान कह रहे हैं कि आखिर कब तक हमारे ऊपर गलत निर्णय थोपे जाते रहेंगे। आखिर हम यशवंत सिन्हा को क्यों वोट देते! आखिर उन्होंने झारखंड या देश के लिए किया ही क्या है। पार्टी लाइन से अलग हट कर झारखंड के साथ-साथ देश के कई राज्यों के सांसदों और विधायकों ने अंतरात्मा की आवाज पर मतदान किया है। ऐसे में देश का स्थापना के एक सौ साल बाद तक लगातार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीति के केंद्र में रही कांग्रेस को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर उसकी नीतियां क्यों उसे भारतीय राजनीति में हाशिये पर धकेल रही हैं। सोचना होगा कि पुरानी पीढ़ी के अनुभवों का लाभ अब पार्टी की युवा पीढ़ी को मिलना चाहिए, लेकिन साथ ही उसे तपे-तपाये नेताओं की उपेक्षा से भी बचना होगा, ताकि आक्रामक राजनीति के वर्तमान दौर की चुनौतियों का डट कर मुकाबला किया जा सके। झारखंड कांग्रेस के भीतर की स्थिति और उसमें उठे बवंडर की पृष्ठभूमि में पार्टी की भावी रणनीति का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की खास रिपोर्ट।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने अपना 15वां राष्ट्रपति चुन लिया है। भाजपा समर्थित प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुन ली गयी हैं। वैसे तो राष्ट्रपति का चुनाव राजनीतिक नहीं होता है, लेकिन इससे देश की राजनीतिक परिस्थिति का थोड़ा-बहुत अंदाजा मिल ही जाता है। द्रौपदी मुर्मू ने संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी यशवंत सिन्हा को अच्छे-खासे अंतर से पराजित किया। उनकी जीत हालांकि पहले से तय मानी जा रही थी, लेकिन वोटों का आंकड़ा सामने आने के बाद यह साफ हो गया कि उन्हें झारखंड में कांग्रेस के 10 विधायकों ने भी वोट दिया। राजनीति का यह एकदम नया तरीका है, क्योंकि कांग्रेस ने यशवंत सिन्हा को समर्थन दिया था और झारखंड में उसके 18 में से 10 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी। यह भी तब हुआ, जब यशवंत सिन्हा खुद रांची आकर विधायकों से मिल चुके थे। उनके साथ प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे के अलावा प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर भी थे। किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि जिस झारखंड कांग्रेस के पास ‘डैशिंग’ प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष के अलावा चार कार्यकारी अध्यक्ष हों, वह अपने विधायकों को भी एकजुट नहीं रख सकती है। इस तरह से राष्ट्रपति के चुनाव ने झारखंड कांग्रेस के भीतर के खोखलेपन को सामने ला दिया है। पार्टी की हालत बिना पतवार के नाव जैसी हो गयी है, जिसे हर कोई अपनी मर्जी से हांक रहा है।

कांग्रेस की यह हालत एक दिन में नहीं हुई है। पिछले ढाई साल में इसके नेताओं ने संगठन की तरफ ध्यान दिया ही नहीं। दिसंबर, 2019 में विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस ने झारखंड में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 16 सीटों पर जीत हासिल की थी, तब कहा जाने लगा था कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अपने सुनहरे दिन की ओर लौट रही है। उससे छह महीने पहले जब लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर दो अंकों पर सिमट गयी थी और झारखंड की 14 में से महज एक सीट जीत पायी थी, तब किसी ने विधानसभा चुनाव में इतने शानदार प्रदर्शन की उम्मीद नहीं की थी। 31 सीटों पर चुनाव लड़ कर 16 सीटें जीत कर कांग्रेस ने न केवल गठबंधन के दूसरे सबसे बड़े सहयोगी का स्थान बरकरार रखा, बल्कि सरकार में लगभग बराबर की साझीदार भी बनी। पार्टी के चार विधायकों को मंत्री बनाया गया और जोर-शोर से नयी सरकार ने काम शुरू किया। शुरूआत में पार्टी के विधायकों में भी काम के प्रति जबरदस्त उत्साह था, लेकिन समय बीतने के साथ ही यह उत्साह ठंडा पड़ता गया।

झारखंड कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यह सही है कि पार्टी की अंदरूनी स्थिति ठीक नहीं है। जिन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने विधानसभा चुनाव में अपना सब कुछ झोंक दिया और पार्टी की जीत के लिए दिन-रात एक कर दिया, अब उनकी ही अनदेखी से स्थिति विस्फोटक मोड़ पर पहुंचती जा रही है। यहां तक कि पार्टी के विधायकों को भी समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें और किधर जायें। इस नेता की बात बहुत हद तक सही भी है। झारखंड कांग्रेस आज भीतर से कई धड़ों में बंटी हुई नजर आती है। हरेक धड़ा बिना किसी तालमेल या समन्वय के अपना काम कर रहा है। इसका खामियाजा उन विधायकों को भुगतना पड़ रहा है, जो आज भी केवल पार्टी को ही देखते हैं। झारखंड कांग्रेस में एक प्रदेश अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष हैं, लेकिन हकीकत यही है कि किसी के पास कोई काम नहीं है। इसलिए संगठन का काम पूरी तरह रुका पड़ा है।

संगठन की कमजोरी का ही परिणाम है कि पार्टी का कोई नेता भी पार्टी नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से कठघरे में खड़ा कर देता है। पार्टी के प्रदेश प्रभारी और दूसरे नेताओं पर सीधे-सीधे आरोप लगा देता है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस में सब कुछ जुगाड़ पर ही चल रहा है। इस तरह की जुगाड़ वाली व्यवस्था से पार्टी नहीं चल सकती। कांग्रेस के कम से कम दर्जन भर ऐसे विधायक हैं, जो सार्वजनिक तौर पर तो कुछ नहीं कहते, लेकिन निजी बातचीत में उनकी पीड़ा साफ सुनाई देती है। इन विधायकों की तकलीफ यह है कि उनकी बातों को सुननेवाला कोई नहीं है। ये विधायक कहते हैं कि उनकी लगातार उपेक्षा हो रही है। आलाकमान की ओर से कहा जाता है कि वे अपनी बात प्रदेश इकाई के माध्यम से बतायें और यहां उनसे कोई बातचीत ही नहीं होती। ऐसे में ये विधायक अपने इलाके तक सिमट कर रह गये हैं। विधायकों की शिकायत यह भी है कि झारखंड के बारे में कोई भी फैसला बिना उनके मशविरे के ले लिया जाता है, जिससे उनकी स्थिति कमजोर होती है और उन्हें अपनी ऊर्जा आलाकमान के फैसले का औचित्य सिद्ध करने में ही खर्च करनी पड़ती है। पार्टी के कई नेता सवाल उठाते हैं कि पिछले तीन साल से प्रदेश कमिटी का ही गठन नहीं हुआ है, तो एक संगठन के रूप में कांग्रेस की गाड़ी कैसे आगे बढ़ सकती है।

जाहिर है, कांग्रेस के भीतर की यह स्थिति झारखंड के राजनीतिक भविष्य के लिए भी खतरनाक है, क्योंकि यह पार्टी सरकार में साझीदार है और इसके भीतर का असंतोष का असर सरकार की सेहत पर भी पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में झारखंड कांग्रेस को एक ओवरहॉलिंग की जरूरत है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 13.88 प्रतिशत मत मिले थे, जो 2014 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले करीब सवा तीन प्रतिशत अधिक थे। इस शानदार वोट शेयर को बरकरार रखने के लिए पार्टी को अभी से ही काम में जुटना होगा।

कांग्रेस आलाकमान जितनी जल्दी यह बात समझ ले, स्थिति उतनी ही अनुकूल होगी, अन्यथा झारखंड में भी किसी अनहोनी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी झारखंड की पांचवीं विधानसभा में पार्टी के कई ऐसे विधायक हैं, जो पहली बार विधायक बने हैं। उनके भीतर काम करने का जज्बा है और पार्टी को उन्हें आगे बढ़ाने के लिए हरसंभव कदम उठाना चाहिए।

झारखंड कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का दौर है। पार्टी नेतृत्व को नयी पौध और प्रतिभा को पहचान कर उसे अनुकूल स्थान देना ही होगा। राजनीति का नया दौर परिवार और खानदान से नहीं, काम से चल रहा है। इसमें युवाओं जैसी चपलता, फुर्ती और आक्रामकता जरूरी है। इस नये तौर-तरीकों को कांग्रेस जितनी जल्दी आत्मसात कर लेगी, उसके लंबे जीवन के लिए उतना ही लाभकारी होगा। अन्यथा उसका अस्तित्व धीरे-धीरे इसी तरह सिमटता जायेगा और भारत की यह ग्रैंड ओल्ड पार्टी इतिहास के पन्नों में समा जायेगी।

वैसे कहनेवाले तो यह भी कह रहे हैं कि एक सौ साल में तो बड़ी-बड़ी इमारतें भी जर्जर हो जाती हैं, किले भी ढह जाते हैं, फिर कांग्रेस तो 137 साल पुरानी पार्टी है। इसमें दरारें आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। साल 2019 के संसदीय चुनावों में शर्मनाक पराजय और फिर राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद दुविधा में फंसी पार्टी ने जब कई दिनों की कश्मकश के बाद आखिर एक बार फिर अपनी पतवार सोनिया गांधी के हाथों में सौंपी थी, तब ऐसा लगा था कि पार्टी अपनी लीक पर लौट आयेगी। लेकिन कांग्रेस नेताओं की आपसी प्रतिद्वंद्विता, अहं और वैचारिक भिन्नता ने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की साख को खाक कर दिया। इसके कारण कांग्रेस के हाथ में सिर्फ राख ही बच गयी है। अब सोनिया गांधी के नेतृत्व पर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है कि वह इस राख को गंगा में विसर्जित करेंगी या फिर इस राख में दबी चिंगारी से नयी ऊर्जा का प्रज्ज्वलन कर लोकतंत्र की इमारत को पुन: प्रकाशमान करेंगी।

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