देख तेरे बंगाल की हालत क्या हो गयी भगवान…

  • तुष्टीकरण की राजनीति : शर्मसार कर रही दक्षिणी दिनाजपुर की घटना

दुनिया भर के कई देशों में राजनीति और हिंसा एक-दूसरे का अभिन्न हिस्सा हो सकते हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक हिंसा आमतौर पर चुनावी राजनीति से जुड़ी होती है। कई मौकों पर यह कई चरणों में घटित होती है। उदाहरण के लिए बिहार, उत्तरप्रदेश और केरल जैसे राज्यों में चुनाव के दौरान राजनीतिक हिंसा का बहुत लंबा इतिहास रहा है। पश्चिम बंगाल की तो तस्वीर इन सब राज्यों से ही अलग है। यहां केवल चुनाव के दौरान ही हिंसा नहीं, चुनाव के बाद की हिंसा की तस्वीर और भी भयावह हो जाती है। लंबे समय से उग्रवाद, सामाजिक उथल-पुथल, बड़े पैमाने पर पलायन, बांग्लादेशी घुसपैठ और राजनीतिक वर्चस्व के लिए हिंसक भीड़ के इस्तेमाल जैसी घटनाओं से घिरे इस पूर्वी राज्य में राजनीतिक हिंसा की संस्कृति अन्य भारतीय राज्यों की तुलना में कहीं अधिक स्थानिक लगती है। क्योंकि चुनाव के बाद हमेशा लगातार राजनीतिक तौर से जुड़ी हिंसा सामने आती है। बंगाल में राजनीतिक हिंसा की ऐतिहासिक विरासत है। जो धीरे-धीरे तुष्टीकरण की राजनीति में परिवर्तित हो कर सारी मर्यादाओं को लांघ रही है। कम से कम पिछले हफ्ते पश्चिम बंगाल के दक्षिणी दिनाजपुर की घटना तो यही दर्शाती है। चार दिन पहले पश्चिम बंगाल के दक्षिणी दिनाजपुर में एक बच्ची को अनुशासनहीनता पर डांटने पर एक महिला टीचर को विशेष समुदाय के लोगों द्वारा निर्वस्त्र कर पीटा गया। इस मामले ने देश को हिला कर रख दिया है। जिस बंगाल में मां काली की पूजा होती है। जहां की मुख्यमंत्री खुद एक महिला हैं। वहीं महिलाओं को निर्वस्त्र किया जा रहा है। अब लोग कहने लगे हैं कि देख तेरे बंगाल की हालत क्या हो गयी भगवान…। बंगाल किस राह चल पड़ा है बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

भारत के पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल की जनसंख्या लगभग 10 करोड़ है। यहां राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास है, जो कई दशकों से चला आ रहा है। इसने राज्य की राजनीति पर जटिल और गहरा प्रभाव डाला है। भारत की आजादी के बाद से इस राज्य में अलग-अलग राजनीतिक दलों ने अपनी सरकारें बनायी हैं। इसमें कांग्रेस दो दशकों से भी ज्यादा समय तक सत्ता में रही है। कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के नेतृत्व में वाम धड़ा लगभग तीन दशकों तक सरकार में रहा। वहीं मौजूदा दौर में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सत्ता पर काबिज है। अलग-अलग दलों के शासनकाल में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पों की संस्कृति, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, केवल पिछले कुछ सालों में फली-फूली है। इसके चलते पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की घटनाओं ने इसे भारत में सार्वजनिक नीति के लिहाज से सबसे अधिक चर्चित मुद्दा बना दिया है। हिंसा और तुष्टीकरण के कारण बंगाल में पलायन भी एक बड़ा मुद्दा हो गया है। पश्चिम बंगाल में जिस प्रकार से तुष्टीकरण की राजनीति पर जोर दिया जा रहा है, उसका भयावह रूप अब सामने आने लगा है। हाल की एक घटना ने पश्चिम बंगाल को शर्मसार कर दिया है। वहां की पवित्र संस्कृति पर दाग लगा दिया है। घटना ऐसी है, जो किसी भी सभ्य समाज में रह रहे लोगों को अंदर तक झकझोर देगी। पश्चिम बंगाल के दक्षिणी दिनाजपुर में एक बच्ची को डांटने पर एक महिला टीचर को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने निर्वस्त्र कर पीटा। पहले तो इस झुंड ने प्रधानाध्यापक कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद शिक्षकों के कमरों में घुस गये। महिला शिक्षिका के साथ मारपीट करते हुए उन्हें निर्वस्त्र कर दिया। दरअसल छात्रा मुस्लिम समुदाय से संबंध रखती है और कक्षा 9 में पढ़ती है। घटना हिली थाना क्षेत्र के त्रिमोहिनी प्रताप चंद्र हाइस्कूल की है। हद तो तब हो गयी, जब पुलिस ने एफआइआर करने से इनकार कर दिया। घटना के बाद जब लोग सड़कों पर उतरे, विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, तब पुलिस आधेमन से सक्रिय हुई। इसके बाद 35 लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज हुई और उसमें भी सिर्फ चार लोगों को ही गिरफ्तार किया।

टीएमसी ने संभाली वाम की विरासत
1960 के दशक के अंत में पश्चिम बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चा (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी के नेतृत्व में पार्टियों का गठबंधन) एक ताकतवर दल के रूप में उभरा, जिसके कारण राजनीतिक हिंसा की संस्कृति स्थापित हुई। लेकिन इसी कारण से उसका अंत भी हुआ। अब इस विरासत को आगे बढ़ा रही है तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी)। राज्य की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने 2011 के विधानसभा चुनाव में पिछले तीन दशकों से सत्ता पर काबिज रही वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका था। अपने चुनाव अभियान में टीएमसी ने इस बात पर जोर दिया था कि वह वामपंथियों द्वारा प्रचलित प्रतिशोध की राजनीति का खात्मा करेगी। हालांकि, टीएमसी ने सत्ता में आने के बाद चुनावी वायदे को छोड़ पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही हिंसक तरीके अपनाये। तब केवल नौ महीनों के भीतर सीपीआइ (एम) के 56 सदस्य मारे गये थे, जिनके ऊपर कथित तौर पर टीएमसी समर्थकों ने जानलेवा हमला किया था। टीएमसी शासन के दौरान 2018 में जब पंचायत चुनाव हुए, तो उसमें भी मतदान के दिन व्यापक हिंसा देखी गयी, जिसमें 10 लोग मारे मारे गये थे। स्थानीय मीडिया के अनुसार पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में धोखाधड़ी, बूथ कैप्चरिंग और मतपत्रों को जलाने जैसी गतिविधियां होती रहीं, मगर पुलिस अधिकारियों ने उन्हें रोका नहीं। विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं पर हमला करवाया और हत्याएं हुर्इं। टीएमसी ने करीब 34 सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की, क्योंकि उन सीटों पर विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को कथित तौर पर नामांकन दाखिल करने से रोका गया था। साल 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में एक बार फिर हिंसा हुई। चुनावी अभियान के दौरान जो घटना सबसे ज्यादा चर्चा में रही, वो थी 19वीं सदी में बंगाल के समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्या सागर की एक मूर्ति के साथ कथित रूप से भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी तोड़फोड़। इसके बाद टीएमसी और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें शुरू हो गयीं। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने ये दिखाया कि वाम मोर्चा का पतन जारी रहा, वहीं भाजपा राज्य में टीएमसी सरकार के विरुद्ध मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभर गयी। पश्चिम बंगाल की कुल 42 लोकसभा सीटों में से जहां भाजपा ने 18 सीटें झटक लीं, वहीं टीएमसी 22 सीटों पर सिमट गयी। भाजपा का दबदबा जैसे-जैसे बढ़ा, टीएमसी का हिसंक तांडव भी बढ़ता गया। समय के साथ-साथ विधानसभा चुनाव में इसका रूप भयावह हो गया। प. बंगाल में विधानसभा चुनाव मार्च-अप्रैल 2021 में आठ चरणों में हुए थे। भाजपा ने कड़ी चुनौती दी। हालांकि टीएमसी सत्ता के लिए तय आंकड़े हासिल करने में कामयाब रही और ममता के नेतृत्व में फिर सरकार बन गयी। चुनावी परिणाम आने के बाद राज्य और देश के लोगों ने ऐसी हिंसा देखी, जो संभवत: देश में चुनाव के बाद ऐसी हिंसक घटना किसी अन्य राज्य में नहीं दिखी हो। राज्य में एक बार फिर से हिंसा ने जोर पकड़ा। राजनीतिक हत्याएं शुरू हो गयीं। भाजपा कार्यकर्ताओं को मारा जाने लगा। बड़े-बड़े नेता डर से भाजपा छोड़ टीएमसी में घर वापसी के नाम पर फिर लौटने लगे। बलात्कार की घटनाएं बढ़ने लगीं। तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ को सड़कों पर उतरना पड़ा। राष्ट्रपति शासन की मांग उठने लगी। धनखड़ ने ममता के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया।

घटती जा रही हिंदुओं की संख्या, पलायन को मजबूर
ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर जय श्रीराम के नारे पर भी आपत्ति दर्ज करा चुकी हैं। हालत यह हो गयी है कि बंगाल में मुस्लिम समुदाय के लोग खुलेआम महिला स्कूल टीचर को निर्वस्त्र कर पीटने लगे हैं। ममता बनर्जी की वोट बैंक की राजनीति के कारण बंगाल के कई इलाके मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। वहां से हिंदू पलायन को मजबूर हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या एक करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है। अवैध घुसपैठ ने राज्य की जनसंख्या का समीकरण बदल दिया है। पश्चिम बंगाल के आठ सीमावर्ती जिलों में 1971 से लगातार बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिये बस रहे हैं। 1977 से 2011 तक 34 साल तक रही वाममोर्चा सरकार ने इस घुसपैठ को रोकने के बजाय घुसपैठियों को मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड, आधार कार्ड उपलब्ध कराने के साथ ही आवास, जमीन के पट्टे आदि भी दिये। इसकी एवज में 2006 तक वाम मोर्चे को एकमुश्त मुस्लिम वोट मिला, लेकिन 2007 में नंदीग्राम हिंसा के बाद यह मुस्लिम वोटबैंक तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में चला गया। पश्चिम बंगाल में 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी 27.1 प्रतिशत थी। इसके बाद जनगणना तो नहीं हुई है, लेकिन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़े के अनुसार सीमावर्ती आठ जिलों उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और हावड़ा में 35 से 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी हो गयी है। हुगली, बर्धमान और बीरभूम जिला अब इनके नये ठिकाने के रूप में उभरे हैं। 1971 से अभी तक हर 10 वर्ष का जनसांख्यकीय विश्लेषण करने पर 3 से 5 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। वहीं दूसरी ओर इन आठ जिलों में हिंदू जनसंख्या में 3 प्रतिशत तक की कमी पायी गयी है। मशहूर अमेरिकी पत्रकार जेनेट लेवी ने ऐसे खुलासे किये हैं, जो हैरान करने वाले हैं। उन्होंने अपने लेख ‘द मुस्लिम टेकओवर आॅफ वेस्ट बंगाल’ में आशंका व्यक्त की है कि पश्चिम बंगाल जल्द ही एक इस्लामिक राज्य बन जायेगा। जेनेट लेवी ने इसके लिए कई तथ्य पेश किये हैं। इसके लिए मुख्य रूप से बंगाल में बिगड़ते जनसांख्यिकीय संतुलन को जिम्मेदार ठहराया है। कोलकाता में रहने वाले पूर्व नौकरशाह और तृणमूल कांग्रेस के सह फाउंडर सदस्य दीपक कुमार घोष कहते हैं कि वाम मोर्चा की सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को केवल शरण ही दी थी। टीएमसी ने इससे बढ़कर वोट बैंक के लिए इन घुसपैठियों को सत्ता तक में स्थान दे दिया। पार्टी द्वारा उनके उन्नयन के लिए विशेष योजनाएं भी चलायी जा रही हैं। घोष आगे कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कोलकाता और हावड़ा आदि क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बांग्लादेशी मुस्लिम हंै। इतना ही नहीं, बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों के अलावा रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए इन जिलों (विशेषकर दक्षिण व उत्तर 24 परगना) में स्थायी रूप से कॉलोनी बना दी गयी है। पश्चिम बंगाल के इन जिलों की मुस्लिम जनसंख्या का घनत्व इतना बढ़ गया है कि वे 148 विधानसभा सीटों के लिए निर्णायक स्थिति में हैं। मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी 69.5 प्रतिशत, मालदा में 53.3 प्रतिशत, उत्तरी और दक्षिणी दिनाजपुर में 42.8 प्रतिशत, बीरभूम में 39.6 प्रतिशत, तो उत्तरी और दक्षिणी 24 परगना में 36.1 प्रतिशत, वहीं हावड़ा में 30 प्रतिशत और नदिया में 26.76 प्रतिशत है। यह आबादी दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही और धीरे-धीरे राजनीतिक गतिविधियों में भूमिका निभाने लगी है।

आराध्यों के साथ भी हो रहा भेदभाव
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर हिंदुओं की आस्थाओं पर आघात करने से भी नहीं हिचकती हैं। मुस्लिम वोट के लिए ममता बनर्जी हिंदू देवी-देवताओं को बांटने में भी पीछे नहीं रहती। हिंदुओं को बांटने के लिए ममता बनर्जी ने कहा था कि हम दुर्गा की पूजा करते हैं, राम की पूजा क्यों करें? झारग्राम की एक सभा में ममता ने कहा, बीजेपी राम मंदिर बनाने की बात करती है, वे राम की नहीं रावण की पूजा करती है। लेकिन हमारे पास हमारी अपनी देवी दुर्गा हैं। हम मां काली और गणपति की पूजा करते हैं। हम राम की पूजा नहीं करते।

धार्मिक आयोजन भी सांप्रदायिक और सेक्यूलर बन गये
सनातन संस्कृति में शस्त्रों का विशेष महत्व है। अलग-अलग पर्व त्योहारों पर धार्मिक यात्राओं में तलवार, गदा लेकर चलने की परंपरा रही है लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने धार्मिक यात्राओं और शस्त्र को भी सांप्रदायिक और सेक्यूलर करार दे दिया है। गौरतलब है कि जब यही शस्त्र प्रदर्शन मोहर्रम के जुलूस में निकलते हैं तो सेक्यूलर होते हैं, लेकिन रामनवमी में निकलते ही सांप्रदायिक हो जाते हैं।

जब ममता के राज में रामधनु बदलकर रंगधनु किया गया
बांग्ला में इंद्रधनुष को रामधनु यानी राम का धनुष कहा जाता है। लेकिन ममता बनर्जी सरकार की तुष्टीकरण की राजनीति ने इसका नाम रामधनु (इंद्रधनुष) से बदल कर रंगधनु यानी रंगों का धनुष कर दिया। तीसरी क्लास में पढ़ाई जाने वाली किताब अमादेर पोरिबेस (हमारा परिवेश) में रामधनु का नाम बदल कर रंगधनु कर दिया गया। साथ ही ब्लू को आसमानी रंग बताया गया। दरअसल साहित्यकार राजशेखर बसु ने सबसे पहले रामधनु का प्रयोग किया था, लेकिन एक विशेष वर्ग को खुश करने के लिए किताब में इसका नाम रामधनु से बदलकर रंगधनु कर दिया गया। ऐसा करने के पीछे धर्मनिरपेक्षता का तर्क दिया गया है।

तत्कालीन राज्यपाल भी लगा चुके हैं तुष्टीकरण का आरोप
पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी ममता सरकार पर तुष्टीकरण के आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने कहा है कि ममता सरकार में एक विशेष वर्ग को ही मदद दी जा रही है। इसकी इजाजत संविधान नहीं देता। उन्होंने ममता सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि यहां सिर्फ एक वर्ग के लोगों के ही आंसू पोछे जाते हैं।

बदलता रहा राजनीतिक परिदृश्य, नहीं बदली स्थिति
चुनाव के दौरान हिंसा से लोग वाकिफ थे। बंगाल में विधानसभा चुनाव में जो हिंसा की तस्वीर सामने आयी, वह लोगों को न ही उम्मीद थी और न ही कभी देखी थी। चुनाव परिणामों के बाद भड़की हिंसा ने डर और घृणा के माहौल को और बढ़ावा दिया। हत्या, सामूहिक दुष्कर्म, लूटपाट और आगजनी की घटनाएं सामने आयीं। 65-70 साल की बुजुर्ग महिला से लेकर बच्चियों तक से दुष्कर्म किया गया। हजारों लोग बंगाल से भागकर असम, दिल्ली और अन्य जगहों पर शरण लेने को मजबूर हो गये। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में तृणमूल कांग्रेस के नेता भादू शेख की हत्या के बाद 21 मार्च को आठ लोगों की जिंदा जलाकर हत्या कर दी गयी थी। इसमें तीन महिलाएं और दो बच्चे भी शामिल थे। भीड़ ने करीब एक दर्जन घरों को आग के हवाले कर दिया था। विधानसभा चुनाव हुए एक साल बीत चुके हैं। इस दौरान इस तरह की घटनाओं की फेहरिस्त लंबी है। हाल में दिनाजपुर की शिक्षिका को निर्वस्त्र करने की घटना ने लोगों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि बंगाल कहां जा रहा है। क्योंकि विद्वानों का कहना है कि किसी समाज को बर्बाद करना हो, तो शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करो। समाज में मानवता को समाप्त करना हो तो महिला को सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित करो। बंंगाल की दिनाजपुर की घटना दोनों ही परिपेक्ष्य में यही साबित कर रही है।

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