42 साल की भाजपा के सामने अब सर्व-स्वीकार्यता की चुनौती

सफरनामा : अपने सफर में कामयाबियों के कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं पार्टी ने

दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकप्रियता के शिखर पर स्थापित भारतीय जनता पार्टी ने अपना 42वां स्थापना दिवस मनाया है। किसी भी दल के लिए 42 साल का कालखंड कम नहीं होता, लेकिन भाजपा के लिए तो यह सफर ऐतिहासिक रहा।1984 में दो सांसदों से अपना सफर शुरू करनेवाली पार्टी आज 303 सांसदों के साथ देश की सत्ता पर बैठी है, तो इसके पीछे कार्यकर्ताओं का दृढ़ संकल्प, कठोर अनुशासन और लोकतांत्रिक प्रणाली में अटूट विश्वास है। भाजपा यदि आज लोकप्रियता के शिखर पर है, तो यह उसके नेताओं की दूरदृष्टि, पार्टी का समग्र दृष्टिकोण और लोकतंत्र के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का ही परिणाम है। भाजपा का यह 42 साल का सफर कितना कठिन और चुनौतीपूर्ण रहा, यह तो सभी जानते हैं, लेकिन इसके नेताओं की मेहनत और आम लोगों के बीच अपनी पहुंच स्थापित करने के लिए उनके त्याग की कहानी बहुत से लोगों को मालूम नहीं है। इतना सब कुछ होने और पिछले आठ साल देश पर शासन कर रही भाजपा के सामने आज भी चुनौतियां कम नहीं हैं। इसके सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह है सर्व-स्वीकार्यता की। वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत पर चलनेवाली पार्टी के लिए अब समय आ गया है कि वह अपने साथ उस वर्ग को भी जोड़े, जो अब तक उससे बिना किसी कारण के दूर है। यदि भाजपा इस चुनौती को पार कर लेती है, तो फिर उसके लिए आगे का रास्ता बहुत आसान हो जायेगा। भाजपा के 42वें स्थापना दिवस के मौके पर उसके समृद्ध इतिहास की रोशनी में भविष्य की चुनौतियों का आकलन करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह की विशेष रिपोर्ट।

आज से 42 साल पहले 1980 में शुरू हुई भारतीय जनता पार्टी की विकास यात्रा देखते ही देखते कई पड़ावों और मंजिलों को तय कर चुकी है। कभी दो सांसदों वाली यह पार्टी आज की तारीख दूसरे सहयोगी दलों के लिए दो-चार सांसद और विधायक जितवा रही है। 42 साल की हो चुकी इस पार्टी ने अपनी विकास यात्रा में कई महत्वपूर्ण और यादगार पल देखे हैं।

जनता पार्टी से अलग होकर बनी भाजपा
छह अप्रैल 1980 को भाजपा की स्थापना की गयी थी। जनता पार्टी से अलग होकर एक ऐसे दल की नींव रखी गयी, जो भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में विख्यात हुई। भाजपा के पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ बलराज मधोक वाली भारतीय जनसंघ का ही नया रूप भाजपा को माना जाता है। जनसंघ का जनता पार्टी में विलय होने के कुछ ही सालों बाद वैचारिक मतभेद उभरकर सामने आने लगे। इसके बाद अलग संगठन बनाने का फैसला किया गया और भाजपा की नींव पड़ी। जनसंघ की स्थापना डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने साल 1951 में की थी। इसका चुनाव चिह्न दीपक हुआ करता था। जनता पार्टी में जनसंघ के विलय के बाद भी जनसंघ के सदस्यों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता नहीं छोड़ी। जनता पार्टी के कई नेताओं को दो संगठनों की सदस्यता पर आपत्ति होती रहती थी। यही जनसंघ से जनता पार्टी में गये नेताओं के अलग होने की मुख्य वजह बनी। दरअसल, 1925 में डॉ हेडगवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापाना की थी। इसे भाजपा का मातृ संगठन माना जाता है। इसके नेता आरएसएस से अनिवार्य रूप से जुड़े रहते हैं।

भाजपा अपने स्थापना के बाद शुरू के पहले दशक में कड़े संघर्ष के दौर से गुजरी। जनसंघ के दीपक चुनाव चिह्न के बाद भारतीय जनता पार्टी को कमल का फूल आवंटित हुआ। लेकिन कमल के फूल पर भाजपा को चुनाव मैदान में उतरने का मौका 1984 में मिल सका। हालांकि, अपने पहले चुनाव में भाजपा को कोई खास सफलता नहीं मिली। इसके महज दो सांसद ही जीतकर संसद में पहुंचे थे।

रथयात्रा ने भाजपा को सत्ता का स्वाद चखाया
भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने भारतीय राजनीति को बदलने में मुख्य भूमिका तो निभायी ही, पार्टी को भी सत्ता प्राप्ति की राह दिखा दी। यह वह दौर था, जब वीपी सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल को मंडल की राजनीति से फायदा पहुंच रहा था, तो भाजपा एक हिंदूवादी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। आडवाणी के अयोध्या आंदोलन से धार्मिक ध्रुवीकरण को मजबूती मिली। आडवाणी की यात्रा से धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण ने भाजपा को फायदा पहुंचाया। हालांकि, 1989 में भाजपा दो से 89 सीटों तक का सफर तय कर चुकी थी। लेकिन तब वह वीपी सिंह के जनता दल के साथ मिलकर चुनाव मैदान में थी।

1996 में सत्ता का स्वाद चखा
आडवाणी की रथयात्रा अपना काम कर चुकी थी। देश में धार्मिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण शुरू हो चुका था। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राममंदिर आंदोलन तेज हो चुका था। और फिर आयी छह दिसंबर, 1992 की तारीख। उस दिन अयोध्या में बाबरी ढांचा गिरा दिया गया। यहीं से भाजपा की राह आसान होती गयी। फिर 1996 का वह साल भी आया, जब दो सांसदों वाली पार्टी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी थी। राष्ट्रपति ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र की सत्ता भाजपा के हाथ में आयी, लेकिन 13 दिनों में यह सरकार गिर गयी। दो साल बाद एक बार फिर अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला। 1998 में बनी यह सरकार 13 महीने चली। कई दलों के सहयोग से सरकार का गठन किया गया था, लेकिन सफलता नहीं मिली। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक बार फिर लोकसभा का चुनाव भाजपा ने लड़ा। भाजपा इस बार 20 दलों से अधिक के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ी थी। इस गठबंधन को 294 सीटों पर जीत मिली, जिसमें अकेले भाजपा के 182 सांसद जीते थे। अटल जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और इस बार अपना कार्यकाल उन्होंने पूरा किया।
2004 और 2009 की हार से निराश नहीं हुई भाजपा

हालांकि, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सरकार बनाने वाला जनादेश नहीं मिला। वह विपक्ष में बैठी। यह वह दौर था, जब अटल बिहारी वाजपेयी अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर राजनीति से संन्यास ले चुके थे। वह आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव में जाने का एलान कर चुके थे। भाजपा एक व्यापक उठा-पटक के दौर से भी गुजर रही थी। अटल सरकार का कार्यकाल पूरा होने के बाद लालकृष्ण आडवाणी को पीएम के चेहरे के रूप में पेश किया गया, लेकिन भाजपा को 2004 और 2009 में सरकार बनाने लायक जनादेश नहीं मिला।

2014 में मोदी युग की शुरूआत
2014 आते-आते भाजपा में चेहरा बदलने की मांग जोर पकड़ चुकी थी। 2014 के आम चुनाव के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। वह एक नये युग की शुरूआत थी। 2014 के आम चुनाव हुए। 10 साल से सत्ता संभाल रही यूपीए सरकार को जनता नकार चुकी थी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन को जनता ने प्रचंड बहुमत से जीत दिलायी। भाजपा ने 282 सीटों के साथ सरकार बनायी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने।

फिर 2019 में भाजपा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर केंद्र की सरकार में आयी। यही नहीं वह एक-एक कर राज्यों में भी सरकारें बनाती गयी। आज 42 साल की इस यात्रा में भाजपा सबसे ताकतवर राजनीतिक दल के रूप में उभर चुकी है।

1951 से 1980 में नये नामकरण तक और 1984 में दो सीटें जीतने वाली भगवा पार्टी के 2014 आते-आते प्रचंड बहुमत मिलने तक की कहानी दिलचस्प है। जिस पार्टी को अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर ने खड़ा किया, अटल बिहारी वाजपेयी ने सहयोगी दलों के समर्थन से सरकार बनायी, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को ऐसा जनसमर्थन मिला कि वह देश के सबसे बड़े नेता बन गये। मोदी-शाह की जोड़ी भाजपा को दुनिया की सबसे पार्टी बनाने में कामयाब हुई। 42 साल में भाजपा के विधायक ‘दिन दूनी रात चौगुनी’ की रफ्तार से बढ़ते गये। 1981 में पार्टी के पास विधायकों की संख्या 148 थी। 1991 में 751 विधायक हो गये। 2001 में 770 और साल 2011 आते-आते 869 विधायक थे। 2022 में इस समय भाजपा के देश में कुल 1296 विधायक हैं।

लोकसभा में दो से 303 सांसद
इसी तरह से सांसदों की बात करें, तो भाजपा के पास 1984 में दो सांसद थे। 1989 में 85, 1991 में 120, 1996 में 161, 1998 में 182, 1999 में 183, 2004 में 138, 2009 में 116, 2014 में 282 और 2019 के चुनाव में पार्टी के 303 सांसद जीतकर लोकसभा में पहुंचे।

एक करोड़ से 22 करोड़ वोट का सफर
इसी तरह वोट शेयर की बात करें, तो भाजपा को 1984 में 1.82 करोड़ वोट मिले थे। 1989 में 3.41 करोड़, 1991 में 5.53 करोड़, 1996 में 6.79 करोड़, 1998 में 9.42 करोड़, 1999 में 8.65 करोड़, 2004 में 8.63 करोड़, 2009 में 7.84 करोड़, 2014 में 17.1 करोड़, 2019 में 22.9 करोड़ वोट मिले।
आगे की चुनौतियां

भाजपा ऐसी पार्टी के रूप में स्थापित हो चुकी है, जिसका हर फैसला भारतीयता के लिए होता है और राष्ट्रनिर्माण ही जिसका अंतिम उद्देश्य है। इस उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही पार्टी के लिए वसुधैव कुटुंबकम के अपने सिद्धांत को स्वीकार्य बनाना ही होगा। इतनी लोकप्रियता हासिल करने के बावजूद देश का एक वर्ग आज भी भाजपा से अलग है। इस वर्ग को अपने से जोड़ना ही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के अन्य शीर्ष नेताओं, अमित शाह, जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ जिस संकल्प के साथ पार्टी को सर्व स्वीकार्य बनाने के अभियान में जुटे हुए हैं, यह लक्ष्य भी बहुत दूर नहीं लगता है।

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