इंस्पेक्टर की आत्महत्या ने लगाया झारखंड पुलिस की वर्दी पर गहरा दाग

  • साढ़े पांच साल पहले तोपचांची थाना में हुई थी इसी तरह की वारदात : तब से अब तक दो दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी दे चुके हैं जान

झारखंड पुलिस की वर्दी एक बार फिर दागदार हुई है। इस बार पलामू जिले में तैनात एक इंस्पेक्टर ने निलंबन के चार दिन बाद ही थाना परिसर में फांसी के फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली और अपने पीछे कई सवाल छोड़ गये। इंस्पेक्टर लालजी यादव से पहले लगभग इसी तरह की परिस्थिति में 2016 के जून महीने में धनबाद के तोपचांची थाना के तत्कालीन प्रभारी उमेश कच्छप ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी। वह भी कुछ दिन पहले अपने थाना क्षेत्र में हुई एक फायरिंग मामले को लेकर तनाव में थे। इन दोनों घटनाओं में वक्त का फासला भले ही साढ़े पांच साल का है, लेकिन परिस्थितियां लगभग एक जैसी हैं और दोनों घटनाओं ने सवाल भी एक जैसे ही छोड़े हैं। लालजी यादव को चार दिन पहले एसपी ने सस्पेंड किया था, हालांकि उनके परिजनों ने जो आरोप लगाये हैं, उनसे पलामू पुलिस के वरीय अधिकारी कठघरे में आ गये हैं। इसी तरह उमेश कच्छप के परिजनों ने भी अधिकारियों पर कई गंभीर आरोप लगाये थे, लेकिन उन आरोपों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस तरह अपने ही दो तेज-तर्रार अधिकारियों की असमय मौत ने झारखंड पुलिस की वर्दी को दागदार बना दिया है, हालांकि बीच में पुलिसकर्मियों और कनीय अधिकारियों द्वारा आत्महत्या की कई घटनाएं हुई हैं। पलामू में इंस्पेक्टर की आत्महत्या की पृष्ठभूमि में झारखंड पुलिस में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति और अफसरों की सवालिया कार्यशैली पर आजाद सिपाही के राज्य समन्वय संपादक अजय शर्मा की खास रिपोर्ट।

पलामू के नवा बाजार थाने के निलंबित थाना प्रभारी लालजी यादव ने तीन दिन पहले थाना परिसर में ही आत्महत्या कर ली। पलामू के एसपी ने उन्हें निलंबित कर दिया था। बताया जाता है कि खुद को निलंबित किये जाने के बाद से वह बेहद तनाव में थे। उनके निलंबन का कारण यह था कि उन्होंने डीटीओ द्वारा जब्त वाहनों को थाने में रखने से इनकार किया था। लेकिन लालजी यादव के परिजनों ने पलामू पुलिस के उच्चाधिकारियों के सामने जिस तरह के आरोप लगाये हैं, उन पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण पहली नजर में सामने नहीं आता है। आरोपों के अनुसार 2012 बैच के दारोगा लालजी यादव तेज-तर्रार छवि के थे और गलत कार्यों का हमेशा विरोध करते थे। आम लोग उनका बेहद सम्मान करते थे। अपने ही कुछ उच्चाधिकारियों द्वारा इलाके के बालू तस्करों को संरक्षण देने की जानकारी उनके पास थी। इसके अलावा वह अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के वसूली अभियान को रोकने की दिशा में बहुत आगे बढ़ चुके थे। उन्हें अपने ही विभाग के कुछ अधिकारियों ने इतना प्रताड़ित किया कि वह तनाव में आ गये और आत्महत्या कर ली। उनके पिता ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि लालजी यादव से हर महीने पांच लाख रुपये मांगे जा रहे थे।

लालजी यादव की आत्महत्या की घटना ने 17 जून, 2016 को धनबाद जिले के तोपचांची थाना के तत्कालीन प्रभारी उमेश कच्छप की आत्महत्या की याद को ताजा कर दिया है। उमेश कच्छप अपने थाना क्षेत्र में कुछ दिन पहले हुई फायरिंग की एक घटना के बाद से तनाव में थे। उस घटना में वह खुद शामिल नहीं थे, लेकिन कुछ आइपीएस उन पर मनमाफिक रिपोर्ट बनाने के लिए दबाव डाल रहे थे। कहा जाता है कि फायरिंग की वह घटना जीटी रोड पर अवैध वसूली के क्रम में हुई थी, जिसमें एक डीएसपी ने एक ट्रक ड्राइवर को गोली मार दी थी। उमेश कच्छप पर डीएसपी को बचाने के लिए दबाव डाला जा रहा था, जिसके कारण वह बेहद तनाव में थे।

इन दोनों घटनाओं में बहुत कुछ एक जैसा है और लालजी यादव की आत्महत्या ने वही सवाल खड़े किये हैं, जो उमेश कच्छप की मौत ने उठाये थे। आखिर ईमानदार और तेज-तर्रार छवि के कनीय पुलिस अधिकारियों पर इतना तनाव हावी कैसे हो जाता है। क्या पुलिस महकमे में कुछ अधिकारी वाकई ऐसे हैं, जो अपनी चमड़ी बचाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं। मानव मनोविज्ञान कहता है कि कोई इंसान आत्महत्या तभी करता है, जब उसके सामने के सारे विकल्प खत्म हो गये लगते हैं। आत्महत्या करनेवाला व्यक्ति किसी एक कारण या घटना से प्रभावित नहीं होता, बल्कि यह उसके लिए तात्कालिक कारण हो सकते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि प्रतिष्ठा या इज्जत पर आंच आता देख भी कई लोग इतने अधिक तनावग्रस्त हो जाते हैं कि वे आत्महत्या कर लेते हैं। लालजी यादव और उमेश कच्छप की आत्महत्या के पीछे यही प्रत्यक्ष कारण नजर आता है, हालांकि जांच चल रही है और उसका नतीजा आना बाकी है।

लेकिन यहां सवाल यह है कि आखिर लालजी यादव और उनसे पहले उमेश कच्छप के आत्महत्या के पीछे असली वजह क्या थी। झारखंड पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि बीते एक वर्ष के दौरान पुलिसवालों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है। पुलिसकर्मियों पर मानसिक और पारिवारिक तनाव इस कदर हावी है कि वे अपनी जान लेने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। इसकी मुख्य वजह प्रशासनिक दबाव, परिवारिक विवाद, मानसिक तनाव और प्रेम प्रसंग को माना जा सकता है, क्योंकि कई ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जिनमें काम के दवाब और प्रेम में असफल होने के कारण भी पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या की है।

इसका मतलब यह है कि पुलिस की कार्यशैली में ही कुछ कमी है, जिसके कारण पुलिसकर्मी तनाव में आ जाते हैं। राज्य पुलिस में दो साल पहले एक सम्मान अभियान चलाया गया था, जिसका मकसद पुलिसकर्मियों की समस्याओं का निदान करना था। उसके बाद ही आठ घंटे और सप्ताह में छह दिन की ड्यूटी का प्रावधान सख्ती से लागू करने का फैसला किया गया था। पुलिसकर्मियों के मानसिक तनाव को दूर करने के लिए उनकी काउंसिलिंग की भी व्यवस्था की गयी, लेकिन पुलिस अपनी कार्यशैली बदलने और आत्ममंथन के लिए तैयार नहीं हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि तमाम उपाय बेकार साबित हो गये।

ऐसा नहीं है कि इंस्पेक्टर लालजी यादव की आत्महत्या के बाद झारखंड पुलिस के निचले स्तर के अधिकारियों में यह प्रवृत्ति खत्म हो जायेगी। इसके लिए सबसे पहले पुलिस को खुद को बदलना होगा। अपने ही वरीय अधिकारियों द्वारा अनावश्यक दबाव बनाने और राजनीतिक-प्रशासनिक दृष्टिकोण से कार्रवाई करने की प्रवृत्ति पर तत्काल सख्ती से रोक लगानी होगी।

अधिकारियों को समझना होगा कि ऊपर से लेकर नीचे तक के खाकी वर्दी वाले एक टीम के सदस्य हैं और किसी के रैंक से उसकी काबिलियत नहीं आंकी जा सकती। जब तक ऐसा नहीं होगा, तोपचांची और नवा बाजार थाना जैसी वारदात होती रहेगी और झारखंड पुलिस की वर्दी पर अपने ही साथियों के खून के छींटे पड़ते रहेंगे।

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